धर्मनिरपेक्ष नहीं, हमें धर्मविहिन बनना है

मेरी सबसे जो अच्छी पहचान करवानी है, वो फिल्म में ही हुई है। फिल्म वालों को मुझसे शायद कुछ दुश्मनी है, इसलिए वो लोग हमेशा फिल्मों में मेरी पोल-खोल करते रहते हैं। Gandhi my father नाम की एक फिल्म आयी थी, जो मेरे दोस्त फिरोज अब्बास खान ने बनाई थी। बापू और उनके बड़े बेटे हरिलाल के बीच में जो संघर्ष हुआ था उसपर वो फिल्म बनी थी। उसके एक सीन में अक्षय खन्ना जिसने हरिलाल का पात्र निभाया था, वो दारू के नशे में धूत रात को अपने मोहल्ले में पहुँचता है। जिन्दगी भर सब लोगों की फटकारे पड़ती रहने के कारण वो उब चुका होता है और उस सीन में वो बहुत डिस्टर्ब्ड होकर, एक्साइट होकर रात के अंधेरे में शोर मचाता है। एक डाइलोग उसमें लिखा था, “हां, मैं गांधी की बिगडी हुई संतान हूं।” फिरोज अब्बास खान ने रिलीज के पहले मुझे बुलाया की, “आकर देख लो ये फिल्म ठीक लगती है या नहीं?” तब मैंने उससे शिकायत की थी की, “यार, मेरा दोस्त है तू। मेरी पोल तू स्क्रीन पे क्यों खोलता है? क्योंकि शायद मुझे देखकर ही तुमने ये डाइलोग लिखा है कि, गांधी की बिगडी हुई संतान हूं मैं। दोस्ती निभाने का भी कोई धर्म होता है। यार, ऐसी पोल मत खोला कर।” मुझे देखकर लोग कई बार ये कहते हैं, निराश भी होते हैं क्योंकि बापू की कोई भी झलक उनको मेरे शरीर में या मेरी आकृती में दिखती नहीं है। निराश होते हैं लोग, कई बार कहते हैं कि,  “ये गांधी का वंशज नहीं हो सकता।”

मुझे याद है, मैं चेन्नई गया था और वहां रुक्मिणीदेवी अ‍रुंडेल की जो संस्था चलती है, उसमें एक छोटे बच्चों की स्कूल, मॉंटेसरी चल रही थी. उसमें सारे छः-सात साल के बच्चे थे। उनके साथ की मुलाकात के लिए मुझे पहुँचने में देरी हो गई थी। जब मैं वहाँ पहुंचा तो टीचर ने कहा, “बच्चो, जिनका आप इंतजार कर रहे थे वो आ गये हैं। गांधी का परपोता आ गया है।” तो एक छोटी छः साल की बच्ची बोली, “टीचर, झूठ मत बोलिए, ये गांधी का परपोता नहीं है, ये तो कोई पहलवान है।” तो ऐसी निराशा होती है लोगों को मेरे कारण। जो निराश हुए होंगे उनसे मैं माफी मांग लेता हूं कि, ईश्वर ने जैसा बनाया – सॉरी, इस सभा में ईश्वर ने जैसा बनाया ऐसे नहीं बोल सकता – तो मेरे मां बाप ने जैसा बनाया वैसा मैं हूं।

नास्तिकता के बारे में मैं बहुत कन्फ्यूज्ड सा भारतीय हूं। अभी तक नास्तिकता को ठीक से समझ नही पाया हूं। पर उसके साथ मेरी पहचान बहुत बचपन से हुई थी। क्योंकि बापू के जमाने में आंध्रप्रदेश के गोरा नाम के हिंदुस्तान के एक प्रखर नास्तिक थे। वे बापू के पास बहुत आते थे। बापू को नास्तिक बनाने की मोहिम में वे सेवाग्राम आते थे।वहाँ बापू के और उनके काफी संवाद हुआ करते थे। उसके बारे में शायद एक किताब भी है। गोरा ने एथिस्ट नाम से एक पूरी मूवमैंट चलाई थी। एक उनका प्रकाशन भी था, ‘एथिस्ट’ नाम से। गोरा के बाद उनके बेटे लवणम ने अपनी पूरी जिन्दगी भर वो मूव्मेंट आगे चलाई थी। ‘एथिस्ट’ नाम की पत्रिका वो पब्लिश करते थे। हमारे घर पर ये पत्रिका हर महीने आया करती थी। बचपन से मुझे पढ़ने का बहुत जबरजस्त शौक था। जो भी कोई प्रिंटेड चीज घर में आती थी तो उसको पढ़ना मैं मेरा फर्ज समझता था। समझ में आये ना आए, फिर भी वो अक्षर तो पढ़ी ही लेता था मैं। मुझे याद है कि, जैसे ही वो एथिस्ट पत्रिका हमारे घर पे डिलिवर होती थी, मैं घर में शायद अकेला था जो उसे खोल कर पूरी पढ़ लेता था। और मां पिताजी को पूछता की, “इसका मतलब क्या है?” कुछ समझ में नही आता था कि, क्या है? क्योंकि मैं ईश्वर कृपा से पैदा हुआ हूं ऐसा सब मुझे बताते थे। मेरा जन्म भी एक चमत्कार ही था। मैं भी समझता हूं की मेरा जन्म एक चमत्कार ही था क्योंकि, मैं चलती हुई ट्रेन में पैदा हुआ था। नॉर्मल बच्चें हॉस्पिटल में पैदा होते है, मैं चलती हुई ट्रेन में पैदा हुआ था। तो मैं हमेशा ये समझता था कि मैं कुछ अजीब हूँ और इसलिए ऐसा अजीब दिखता भी हूँ मैं। कई लोग मुझे बचपन में देखने आते थे और कहते थे कि, देखो ट्रेन में पैदा हुआ है, फिर भी जिंदा है, चमत्कार ही है। ये तो ईश्वर कृपा से पैदा हुआ है। मुझे पहले से यही पता था। अभी अभी यहा पर सुना कि ईश्वर वगैरह कुछ नहीं होता, सब विज्ञान होता है। कन्फ्यूज्ड दिमाग से तब से ही रहने लगा था और इसका सबसे ज्यादा दोष मै आप नास्तिक लोगों को ही देता हूं कि आपने मुझे कन्फ्यूज कर दिया। कोई कहता है कि ईश्वर कृपा है, कोई रैशनल कहता है कि (केमिकल) रियाक्शन होता है। तो आज तक मै वही सब चीज़ें समझने की कोशिश कर रहा था। क्योंकि, गोरा और बापू के संवाद मैंने पढ़ा थे। गोरा के तर्कों को, बापू के उत्तरों को सुनकर और कन्फ्यूजन बढ़ता था कि किसे मानुं? परदादा को मानुं कि ये आदमी जो बोल रहा है उसे? तो वो बापू और गोरा के बीच में किया हुआ बहुत बढ़िया डाइलोग है और थैंकफूली उसका रेकॉर्ड भी  ‘एथिस्ट’ में है।

यहा मै आया हूं तो मैं कुछ फिलोसौफिकल बात करूँगा ऐसी उम्मीद मुझसे मत रखिएगा। अभी पिछले दिनों ही एक ऑनलाइन परिषद हुई थी, वहा पर मुझे बोलने के लिए बुलाया था। भारत के आजकल के हालातों पर बात हो रही थी. जो अमेरिका में लिबरल, उदार भारतीयों की एक संस्था चलती है उन्होंनो ये पॉलिटिकल डाइलोग रखा था। भक्त नहीं है वे लोग, कुछ चुनिंदा सहीष्णुं भारतीय जो अमेरिका में बचे हुए हैं, उनका एक ग्रूप है । वो हर महीने ऑनलाइन इवेंट रखते हैं और लोगों को बुलाकर उनसे बात करवाते हैं। उस इवेंट में मौजूदा हालातों और मौजूदा परिस्थितियों के उपलक्ष में मैंने ये बात कही थी कि, भारत अब जो बन गया है,  हिंदु राष्ट्र बनाने की मुहिम जिस कदर सफल हुई है, वो देखते हुए जिन्दगी में पहली बार मुझे ये लगता है कि, मैंने अपने आपको एथिस्ट घोषित कर देना चाहिए। क्योंकि, अब ये लगने लगा है कि जिस धर्म में मेरा जन्म हुआ उस धर्म को इस हद तक भ्रष्ट कर दिया है कि अब उसे सुधारने, बचाने की उम्मीद दिखती नहीं है। और इसलिए शायद मेरे राष्ट्र को बचाना है तो मेरे राष्ट्र को एथिस्ट राष्ट्र बनाना पड़ेगा। क्योंकि धर्म का जो दुरुपयोग हुआ है, उस के कारण जिस प्रकार की विषारी संस्कृती बन रही है वो बनती हुई दिखाई दे रही है। और इसके प्रमाण है कि लोग जहरीले होते जा रहे हैं, वो तो जहर फैलाने ही वाले हैं, जहरीला काम करने ही वाले हैं. मुझे उसकी चिंता नहीं है। क्योंकि कितने भी आततायी हो जाये, कहीं न कहीं उनको हराया गया है। इतिहास गवाह है कि वो कायमी स्वरूप में सफल नहीं हो पाए है, चाहे कितने भी ताकतवर हो, कितने ही प्रभावशाली हो। लेकिन अंत में किसी न किसी प्रकार से उनका विनाश ही हुआ है। लेकिन जहर को नॉर्मलाइज करने वाली जो जनता बन गई है, उसके कारण जो समाज का नुकसान होता है उसको बदलना बहुत मुश्किल है।

जब पॉलिटिकल डायलोग होता है, तो हम एक दूसरे को ये आश्वासन हमेशा देते रहते हैं कि मोदी जाएगा। वो तय है कि मोदी जाएगा. आज नहीं, कल नहीं, दस साल बाद, लेकिन वो जाएगा जरूर. चिंता ये होनी चाहिए कि वो जाएगा तब तक हमारे लोगों का कितना सारा नुकसान, जो irreversible होगा, वो करके जाएगा। मैं कुछ चुनिंदा उदाहरण देना चाहता हूँ कि, क्यों? क्यों ये बात? क्यों मैं इस कगार तक पहूंच गया कि मैं ये मानने लगा हूं कि अब हमारे संविधान से सेक्यूलरिजम को हटा कर एथिजम को डाल दिया जाया? कि धर्मनिरपेक्ष नहीं धर्मविहीन राष्ट्र होना चाहिए। क्योंकि इस समाज में अब धर्म का दुरुपयोग होते हुए दिख रहा है, और उसके कारण हमारे समाज में जो दूषण आये हैं वो चिंताजनक हैं।

पिछले एक साल में, क्योंकि अब हम कथित अमृतकाल में जी रहे हैं, तो अमृतकाल की शुरुवात जब से हुई तब ही के उदाहरण मैं देता हूँ आपको। राजस्थान में नौ साल के एक दलित बच्चे को अपने सवर्ण शिक्षक के लिए रखे गए मटके से पानी पीने के जुर्म के कारण मार दिया गया। ऐसा कृत्य हुआ, क्या हमारा खून खौला? या अगर खून खौला भी तो कितनों का खौला? कितनों को ये लगा कि ये हरकत सहन करने के हद से बाहर है। उसके खिलाफ जितने जोर से आवाज उठनी चाहिये थी, क्या उतने जोर से आवाज उठी? नहीं उठी! अगर हम देखें तो ज्यादातर लोग चुप्पी साधे बैठे रहें। मैं काउ प्रोटेक्शनवाले गौ-रक्षकों के मॉब लिंचिंग तक नहीं जाता हूँ। ये जो अमानुष कृत्य है, उसके ही बारे में बात करना चाहता हूं। हाँ! मणिपुर के लोगों के लिए आवाज उठी. लेकिन मणिपुर के लिए भी आवाज सिर्फ तब उठी जब हमारे फोन पर मणिपुर की औरतों पर किये गए अत्याचार के विडियोज् हमने देखे। हमें वीडियो देखना पड़ा… वो अत्याचार होने के एक हफ्ते तक सोशल मीडिया पर मेसेजेस आ रहे थे कि, “ऐसा कुछ हुआ है… मैंने सुना है.. वीडियो है? जरा भेजो ना, देखना चाहते हैं।” देखने की क्या जरूरत है? क्या आपको ये सुनकर भी गुस्सा नहीं आता? क्या आपको वो निर्वस्त्र औरतों की लाचारी देखने की जरूरत है? क्या जरूरत है उनके साथ जो हरकत की जा रही थी वो देखने की? क्या तभी जाकर आपको गुस्सा आयेगा? सिर्फ ऐसा कुछ हुआ है, इस खबर से आपका खून नहीं खौलता? ये ऐसा अभी हो रहा है. ७५ साल पहले पार्टिशन के वक्त नहीं हुआ था। पार्टिशन का गुस्सा आज भी निकाल रहे हैं कि, पार्टिशन में हमारी माँ बहनों की इज्जत लूटी थी, उसका बदला हम आज लेंगे। छह महीने पहले की बात, तो क्या वो आपकी माँ बहने नहीं है? क्या उनकी नंगी तस्वीर आपको देखनी की जरूरत पड़ती है? क्यों पड़ती है? कैसा समाज बन गया है यह?

अभी अभी एक वीडियो मध्यप्रदेश से आया था। माफ करना, मेरी भाषा थोडी बिगडी हुई है. इसलिए मैंने कह दिया कि, “मैं गांधी की बिगडी हुई संतान हूँ।” पर एक हरामखोर युवक ने एक आदिवासी दलित के मुंह पर पेशाब की। उसका वीडियो बन रहा था. हम सबको गुस्सा कब आया? जब हमने वो वीडियो देखा। वो वीडियो डाउनलोड करके हम सब ने देखा। वो वीडियो देखने की हमें जरूरत पड़ी. पर उसमे वो जो हरामखोर युवक था, उसको मैं दोष नहीं देता हूं. क्योंकि, उसको तो मैं हरामखोर मानता हूँ। वो तो ऐसी ही हरकते करेगा. पर हमारे समाज की मानसिकता देखो कि, वो जो आदिवासी दलित बच्चा था… जिसके मूंह पर ये हरामखोर पेशाब कर रहा था वो बच्चा नैचिरली भी वहाँ से हिला नही.. वहा से चला नहीं गया… या उसने अपना मुँह ढकने की कोशिश नहीं की. उसको किस हद तक इंडॉक्ट्रिनेट किया था कि ऐसे अत्याचार तुझे सहने ही है, तेरी पोझिशन के कारण. ऐसा समाज हमने कैसे बना लिया? जिसके उपर अत्याचार हो रहा है, वो स्वभाविकता से भी अपने बचाव के लिए कुछ नहीं कर रहा है। उस पूरे वीडियो में वो लड़का जो बैठा है, वो डरा हुआ, सहमा हुआ है, लेकिन ज़रा भी अपना मूँह भी नहीं हिलाता, सर भी नहीं हिलाता अपना। कैसा समाज बना दिया है? कैसी मानसिकता बना दी  है? और ये सब.. 

ये सब धर्म का दुरुपयोग किया है। ये इस कारण हुआ क्योंकि जो गुनाह कर रहा है, उसको भी ये कहा गया है कि, “तू धर्म का काम कर रहा है।” जिसके उपर अत्याचार हो गया है उसको भी ये कह दिया है कि, “ये सहना तेरा धार्मिक फर्ज है।” ऐसा कैसा धर्म हमने बना दिया? ऐसा कैसा समाज हमने बना दिया? उसमें फिर ये सिर्फ फिलॉसॉफिकल चीजें डिस्कस करके हमको क्या मिलनेवाला है? क्या इसमें से हमें कोई सोल्यूशन मिल सकता है?

ये बात जो मैंने आज की है, मैंने पहले नहीं की. आज ही की है. लेकिन क्या इसके लिए हम काम कर सकते हैं कि ये वक्त आ गया है कि सेक्यूलरिजम को निकाल के एथिजम को संविधान में डाले हम? क्या हम ये कर सकते हैं? हम कितने कन्वीन्स्ड है ये करवाने के लिए? क्या इसकी ज़रूरत नहीं है? ऑन अ लाइटर टोन, ये तो मैंने बड़ी जो दुर्घटनाएं हुई हैं, अमानवीय कृत्य हुए हैं, उसके बारे में बात की। आप लोगों में से कितने लोग ये मानते हैं कि, हमारी न्यायव्यवस्था ओवर लोड़ेड है? उसके उपर बहुत केसेस का दबाव डाला गया है, और उसको कुछ हलका करने की जरूरत है। आपने कभी देखा है कि उस न्यायव्यवस्था में सबसे ज्यादा केसेस किस चीज के होते हैं? हमारी धार्मिक भावनाए हता हुई है, इसलिए हम केस करना चाहते हैं। हमारी जाती का अपमान किया गया है इसलिए हम केस करना चाहते हैं। जो माना हुआ अपमान है, उसने किया कि नहीं मुझे नहीं मालूम. मुझे लगता है मेरा अपमान हुआ या मेरे धर्म का अपमान हुआ या मेरी जाती का अपमान हुआ। तो धर्म को ही हटा दो, तो ये अपमान भी निकल जाएगा और न्यायव्यवस्था का आधा बोज खतम हो जाएगा। राहुल को disqualify उसी पे से किया था ना, कि जाति का अपमान हुवा? जाती ही ना रहे तो फिर disqualification ही नहीं होगा। तो ये सारी चीजों को हम किस तरह से समझे? क्योंकि किसी को जाकर कहो कि, “भाई एथिस्ट बन जाओ, अपने भगवान को भुला दो।” मुश्किल है! पर अगर ये समझ में आये कि, “भाई तुम्हारे भगवान का दुरूपयोग होकर ये समाज कैसा बना दिया गया है और ये सारी चीजे हमे कैसे भुगतनी पड़ रही हैं?” तो शायद कुछ आशा हो सकती है उनको बदलवाने की। 

बहुत कठिन है. लेकिन शायद कुछ आशा उभर सकती है। क्योंकि, आज भगवान को भी हमने रिच्युअल बना दिया है। अभी महाराष्ट्र का एक बहुत बड़ा त्योहार शुरू होगा, गणपती! बहुत अपनी धार्मिकता दिखाने के लिए मूर्तियां लाई जायेगी। दस दिन सारे जो रिच्युअल हैं, सारी जो प्रथाएं हैं वो बहुत निष्ठा से मनाई जायेगी। दसवे दिन विसर्जन के बाद, जैसे थे! कोई फरक नहीं पड़ेगा। उनके संस्कारों में, आचरण में गणपती के आने से कोई फरक नहीं पड़ेगा। क्योंकि, पता है कि दस दिन का है। 

जितने उत्साह से श्रावण के पहले और श्रावण के बाद गटारी मनायी जाती है, उतने प्रामाणिकता से श्रावण नहीं मनाया जाता है। मेरे सारे दोस्त विदाउट फेल गटारी मनाते हैं। सारे के सारे. श्रावण शुरू हो रहा है, गटारी मनानी है। श्रावण के पहले की वीकेंड पे इकठ्ठा होके गटारी मनाते है. मुझे गटारी के लिए बहुत आमंत्रण होते है, क्योंकि उनकी पत्नीयां पूछती है, “तुषार भाई आ रहे है क्या? तुषार भाई आ रहे है तो हमको दिलासा है. हम जानते है कि तुम्हारी गटारी होने के बाद तुमको वो घर तो वापस ला ही देगा। सेफ और साउंड।” तो मैं गटारी का सबसे पॉपुलर गटारी गेस्ट होता हूँ। मैं हमेशा उनको कहता हूँ कि, “एक दिन घर ले जाने के बदले तुमको गटर में फेक के आऊंगा, अटलिस्ट नाम तो सार्थक होगा कि गटारी मनाई गई है।”  यह सारी चीजे किस तरह से रिच्युअलाइज हो गई हैं? और उसके कारण किस तरह से सब चीज के साथ हमने समझौते कर लिये हैं? अपनी सहूलियत के मुताबिक उनको अडाप्ट कर लिया है?

कपड़ा इधर से टाइट है, इधर से लूज है, तो जाओ टेलर के पास. जाकर सिलवा लो। वैसे ही धर्म और हमारे रिवाजों के साथ हमने अल्टरेशन्स करकरके अपनी मनपसंद फिट का उसको बना दिया है। ये सारी चीज़े समझना बहुत जरूरी हो गई है कि, किसी भी चीज़ की जो sanctity, पवित्रता होती है, उसे हमने रहने ही नहीं दिया है। उसको फॉलो करने की कोशिश की है, लेकिन अपनी मुताबिक फॉलो करते हैं और इसी लिए ये सारे करप्शन आना शुरू हो गये है। 

हमे यह सोचना बहुत जरूरी है कि इस मुल्क में आज जिस प्रकार से सामाजिक और राजनैतिक का फर्क मिटा दिया गया है और जिस कदर घृणा की राजनीति हमारे घरों के अंदर तक खेली जाती है, वो एक चिंता का विषय है। क्योंकि मेरे जैसे कुछ आवाज चिंता प्रदर्शित करते है, तो पहले पूछा जाता था “हिंदू नही है?” अब कहा जाता है, “मुल्ला कब बन गया?” मुझे हमेशा मेरे सारे रिश्तेदार, दोस्त कहते हैं, “यार तू मत बोल, तू तो मिया है। तू उन्हीं की बात करेगा।” ये ‘हम’ और ‘वो’ जिस सहजता से हम और वो किये गये हैं, बनाये गये हैं और विभाजन किया गया है वो कैसे तूटेगा? सेक्यूलरिजम से नहीं तूटने वाला! हम और वो की अलग पहचान नहीं मिटाएंगे, तब तक वो होगा नहीं। महज़ सेक्यूलरिजम से नहीं तूटने वाला. क्योंकि सबसे पहला अटैक इन लोगों ने सेक्यूलरिजम के उपर करके उन सेक्यूलर मूल्यों को ही उन्होंने डिफेम कर दिया। आज अगर मैं मेरी टीशर्ट पहन कर निकलू, की I am secular,  तो उसके बाजू में वो अडवानी आकर ‘सूडो’ लिख देगा. यही पहचान रह गई है उसकी। और इसलिए धर्मनिरपेक्ष नहीं, अगर हम धर्मविहिन बने तो ही शायद इसका इलाज होगा. क्यूंकि इस सनातनी धर्म के भ्रष्ट स्वरूप ने सारे जो सुधारक थे उन सब को नाकामयाब कर दिया है। फुले से लेकर आंबेडकर तक के सारे समाजसुधारक जो जाती या धर्म के विरोध को मिटाने के लिए अपनी पूरी जिन्दगी दे गए, उन सब को हरा दिया। उसमें गांधी भी उतने ही निष्फल थे, क्योंकि समता की जो बात बापू और आंबेडकर ने की वो हमारे समाज ने सफल होने नहीं दी। बापू का भी तरीका निष्फल हो गया, बाबासाहेब आंबेडकर का भी तरीका निष्फल कर दिया गया। बापू ने ये कोशिश की कि, “सबको मिला कर एक बना दे और समता ले आए,” वो नहीं होने दिया। बाबासाहेब ने कहा, “अगर अलग चाहते हो, तो हम अलग रहते हैं और अलग रह कर कानूनन समता बनाते हैं।” रिजर्वेशन की पॉलिसी बाबासाहेब ने सबसे पहले सिर्फ दस साल के लिए लगाई थी और उनको भरोसा था कि, दस साल में समता हो जाएगी, हम सब एक हो जायेंगे। पचहत्तर साल हो गये ना आज? पचहत्तर साल के बाद आज भी कोई एजिटेशन चल रहा है ना रिजर्वेशन के लिए? तो बाबासाहेब को किसने हराया? हमारे समाज ने हराया! कि जो चीज दस साल में होनी चाहिये थी, वो हमने पचहत्तर साल में नहीं होने दी। वो सारी जो सिस्टम सोशल इंजिनियरिंग की उन्होंने की थी, वो सारी हमने हरा दी. क्यों हरा दी? क्योंकि कानून और न्याय के प्रभाव से ज्यादा धर्म का प्रभाव हम पर हावी हैं. और इसका नतीजा हम सब देख रहे हैं।

एक हजार साल का रिपब्लिक लाने वाले थे। अब एक हजार साल का हिंदूत्व शायद लाने वाले हैं। सोचिए, एक हजार साल की विषमता, एक हजार साल की घृणा और एक हजार साल का आतंक! इसलिए, जब कैंसर होता है तो उस अवयव को ही काट कर फेक दिया जाता है। तो टाइम आ गया है कि हिंदू, जो धर्मिक हिंदू है उसको भी शायद अब टर्मिनल सर्जरी की ज़रूरत पड़ेगी। तो टर्मिनल सर्जरी यही हो सकती है कि अपने आपको अधार्मिक कहलाना है। बहुत-बहुत शुक्रिया। धन्यवाद!

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धर्मनिरपेक्ष नहीं, हमें धर्मविहिन बनना है

Comments 4

  • Genuine from heart,
    confused but thought provoking.

  • तुषार गांधी या लेखात सनातनधर्मातिल जातिभेदामुळे उद्भवणाय्रा घटनांची साद्यंत माहिती देऊन धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर), धर्मविहीन समाज संकल्पना मांडली आहे. हिंदूधर्मातिल जातीभेद त्याज्यच आहेत; व ते मिटवण्यासाठी अनेक समाजधुरिणांनी प्रयत्न केलेले आहेत. खुद्द बाबासाहेब आंबेडकर यांनी दलीत-मागासवर्गियांच्या उत्थानासाठी आपल्या राज्यघटनेत आरक्षणाची तरतूद फक्त दहा वर्षांसाठी केली होती, आणि त्याचा उल्लेख तुषार गांधी यांनी त्यांच्या लेखातही केलेला आहे. पण आपल्या देशाचे पहि्ले पंतप्रधान जवाहरलाल नेहरू यांनी हिंदुंमध्द्ये फूट पाडण्याच्या कुटील हेतूने ती तरतूद फक्त कायमस्वरुपी केली नाही, तर त्यात ओबीसीची भर घातली; हेही तुषार गांधिंनी माहित असेलच. तसे पाहिले तर जातीभेद फक्त हिंदू धर्मातच नसून ते इस्लाम आणि ख्रिश्चन धर्मात सुध्दा आहेत. पण सर्व तथाकथित समाज सुधारक फक्त सनातन धर्मावरच आक्षेप घेताना दिसतात. तीच गोष्ट अंधश्रध्दे बाबत म्हणता येईल. अगदी अनीसच्या दाभोळकरांपासून सर्व समाजसुधारक अंधश्रद्धा निर्मुलनासाठी हिंदूधर्मालच लक्ष करताना दिसतात. ख्रिश्चन, वा इस्लाम धर्माविरुद्ध ब्रसुध्दा काढताना दिसत नाहीत. असा दुटप्पीपणा खटकल्याशिवाय रहात नाही. नास्तिक लोक देवाचे अस्तित्व नाकारत असतात. पण आपला सनातनधर्म हा वास्तवात धर्म नसून आचारसंहिता आहे; जिचा पाया विज्ञानावरच आधारलेला आहे. आपले ऋषिमुनी हे वास्तवात वैज्ञानिकच होते आणि हिंदूधर्मातिल सर्व प्रथा-परंपरा या विज्ञानावरच आधारलेल्या आहेत. पण त्या लोकांच्या गळीउतरवण्यासाठी त्यांनी देव-देवतांचा आधार घेतलेला होता. आता त्याचा कांही स्वार्थी लोकानी जसेकी पौरोहित्य करणाय्रांनी लाभ उठवून कर्मकांडं चालू केली; हा सनातन किंवा हिंदूधर्माचा दोष म्हणता येणार नाही.

  • आपण आपली जात धर्म जन्माने ठरवतो . पूर्वी ती आपल्या जन्म दाखल्यावर पण असे . आपण व्यक्ती स्वातंत्र्याच्या गप्पा मारतो पण ते इथे लागू होत नाही असे होते .[ आता तर जनगणना
    त्यानुसारची ( आणि पुढचा गोंधळ ) मागणी होत आहे . ] त्यासाठी असे करायला पाहिजे हिंदुस्थानातील उगम पावलेल्या सर्व धर्माचे योग्य, परिपूर्ण, तुलनात्मक आजच्या विज्ञान युगात योग्य पटेल असा एक अभ्यासक्रम दहावीपर्यंत तयार करावा आणि नंतर प्रत्येक नागरिकास त्याचा धर्म निवडू द्यावा

तुमचा अभिप्राय नोंदवा

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