मैं और मेरी नास्तिकता

मैँ बहुत आभारी हूं कि आप लोगों ने मुझे यहां, इस जलसे में बुलाया. यहां आकर मुझे बहुत खुशी है कि इतने अंधेरे में भी लोग दीये जलाये हुए हैं.  और गम इस बात का है कि २१वीं सदी में नास्तिकता पर चर्चा हो रही है. एक ऐसा विषय जिसका फैसला १८वीं सदी में ही हो जाना चाहिए था. सच्ची बात तो यह है कि नास्तिकता तो ऐसी होनी चाहिए थी, जैसे ऑक्सीजन. हम सांस लेते हैं, तो सोचते थोड़े हैं कि हम सांस में ऑक्सीजन ले रहे हैं. नास्तिकता हमारे जिंदगी का हिस्सा ऐसे ही हो जाना चाहिए था. इस मकाम पर हमारे पास जो नॉलेज है और जो ज्ञान इंसान ने प्राप्त कर लिया है, उसके होते हुए कोई भी धर्म बचा रह जाए, यह बड़ी हैरत की बात है. चूंकि, धर्म तो ये मानते हैं – खास तौर से सारे के सारे इब्राहिम रिलिजन – जूडाइज्म, क्रिश्चियनिटी, इस्लाम – कि ये कुछ सौ किलोमीटर के जिस दायरे में जन्मे थे, केवल उस दायरे में ही भगवान ने सारा ज्ञान दे दिया था. यह मानते हैं कि इन्सान ऐसे पैदा हुआ, दुनिया ऐसे बनी, यह ऐसे हुआ, वह वैसे हुआ. और उन्हें सब पता है…

धर्मों में एक अच्छी बात है. धर्मों की सारी किताबें जमा कर लीजिए, तो बड़ी आसानी से मालूम होता है कि यूनिवर्स कैसे बना? How to make universe in four easy lesson! परंतु साइकिल कैसे बनाते हैं, यह किसी धार्मिक किताब से आपको पता नहीं चल सकता. सिरदर्द की दवा नहीं मिल सकती उनमें… बाकी जन्मोजनम का सुख मिल जाएगा.

आज से ५०० बरस पहले की बात है कि एक आदमी ने हिम्मत की थी अलग कुछ कहने की. उसे जेल में बंद कर दिया गया और मौत की सजा देनेवाले कहते थे कि इसकी हिम्मत कैसे हो गई ऐसा कहने की; कि धरती सूरज के चारों तरफ घूमती है. हमारी किताब में तो कुछ और लिखा है. इसे मालूम नहीं कि इसी धरती के लिए तो पूरी सृष्टि बनी है… यह सारी सृष्टि चारों तरफ है. बीच में हम हैं और हमको बनाया है खुदा ने… और हम हैं इस पूरी सृष्टि के राजा… और यह बोल रहा है : हमारी धरती – जिस पर हम हैं, हमारा हेडऑफिस है – वो घूम रही है सूरज की चारों तरफ…

उस बेचारे गैलीलियो ने माफी मांग ली… ‘‘साहब, मुझसे गलती हो गई. सच है कि सूरज ही घूमता है.’’ तब जाकर उसकी जान बची. फिर कुछ दिनों बाद उसके जमीर ने, उसकी आत्मा ने उसे झंझोड़ा… तो वह बोला, ‘‘नहीं भैया! तुम मुझे मार डालो, चाहे कुछ भी करो, घूमती तो पृथ्वी ही है.’’ 

वे लोग, जो गैलीलियो को मौत की सजा दे रहे थे, वे पागल नहीं थे, वे जाहिल थे. जाहिल और पागल होने में फर्क है. जो उनका ज्ञान था, वही उनका विश्वास था, वही उनकी आस्था थी. उनके ज्ञान और उनकी आस्था में कोई अंतर नहीं था. यही वे जानते थे, यही वे मानते थे. ये पहली दफा हुआ है, २०वीं और २१वीं सदी में कि आपका अपना माना हुआ ज्ञान और आपकी आस्था एक-दूसरे के खिलाफ जा रहे हैं. आज से १०० साल, २०० साल या ५०० साल बाद कोई शिक्षक छठी कक्षा में बच्चों को जब हमारे आज के जमाने के बारे में, २०वीं सदी के बारे में, २१वीं सदी के बारे में पढ़ा रहा होगा, तो बच्चे हंसते-हंसते गिर पड़ेंगे कुर्सी से… और शिक्षक कहेगा, ‘‘बेटा, मजाक मत समझो… परीक्षा में यह सवाल आ सकता है २०वीं या २१वीं सदी पर… इसलिए ध्यान से सुनो.’’

आप मानते हैं कि सूरज के चारों तरफ धरती घूम रही है और आप फिर भी उसी किताब को पढ़ते हैं, जिस किताब की वजह से गैलीलियो को फांसी होने वाली थी. यह क्या है? यह पहले कभी नहीं हुआ था. ऐसा २०वीं सदी में शुरू हुआ है और आज भी चल रहा है. आपका ज्ञान और आपकी आस्था एक-दूसरे के दुश्मन है और दोनों आप के ही अंदर हैं. यह एक मानसिक बीमारी है. इसका नाम है शिजोफ्रेनिया (schezophrenia). लेकिन, दुनिया में इतने बीमार हैं कि जो सेहतमंद है, वह पागल लगता है. हम पागल इसलिए हैं कि हमारी आस्था और हमारे ज्ञान में अंतर नहीं है. जिसकी आस्था और ज्ञान में एक कटाछनी आपस में ही है, वह ठीक है. 

अब कहा यह जाता है, कि भाई अगर किसी को उससे शांति मिलती है, सुख मिलता है, उसके अंदर चैन पैदा हो जाता है, तो तुम्हें क्या तकलीफ है? मुझे कोई तकलीफ नहीं. मगर फिर मुझे बराबर का अधिकार चाहिए. एलन मस्क दुनिया का सबसे अमीर आदमी है. मैं यह अगर मानने लगूं कि वह मेरा चचेरा भाई है, तो मुझे बहुत शांति मिलेगी. आपको कोई एतराज तो नहीं है? मगर आप मुझे पागल कहेंगे, इसलिए कि जो मुझे शांति मिल रही है, वह गलत बात की वजह से मिल रही है. मतलब, शांति अगर आपको गलत बात से मिल रही है, तो वह ठीक नहीं है. बहस की खातिर कह सकते हैं, मैं मानता नहीं हूं, किंतु कह सकते हैं कि एक आदमी है, जो घर में पूजा-पाठ करता है, नमाज़ पढ़ता है, या जो भी करता है… और नमाज़ अगर पढ़ता है, तो लाउडस्पीकर लगाकर नहीं पढ़ता…. तो वह कोई समस्या तो खड़ी नहीं कर रहा… तो आपको क्या तकलीफ है भाई? करने दीजिए उसे. आदमी तो ठीक-ठाक है. बाहर काम-धंधा सही कर रहा है…. और चलो मान लेते हैं कि इससे उसे चैन है…

अब एक चीज और भी देखते हैं… एक सर्वे किया गया था अमेरिका में; कि सबसे ज्यादा उमर किसकी लंबी होती है. वह आदमी जो एक बोतल शराब पीता है या वह जो पूरी पीता है या वह जो नापकर दो पैग पीता है या वह जो बिल्कुल नहीं पीता! परिणाम निकला कि अमेरिका में सबसे लंबी उमर उन लोगों की है, जो नापकर दो पैग पीते हैं और खाना खा लेते हैं. बहुत अच्छी बात है… फिर हम शराब को बुरा क्यों कहते हैं? यह तो भाई दवाओं में भी डाली जाती हैं… व्हिस्की की बोतल लाल रंग की होती है… उस पर लाइट पड़ रही हो, तो बहुत खूबसूरत भी लगती है… तो कष्ट क्या है? हो सकता है कि दो पैग पीने से आपकी सेहत अच्छी होती हो, लेकिन शराब में टेंडेंसी यह है कि यह दो पैग से आगे बढ़ती है… आपने आज तक नहीं सुना होगा कि एक आदमी दूध पी-पीकर मर गया. दूध की लत नहीं लगती… दारू की लगती है… तो इसलिए हम मना करते हैं कि भैया थोड़ी लेना… शायद सेहत के लिए अच्छी भी हो. लेकिन, थोड़ी कोई पीता नहीं है… आमतौर से लोग ज्यादा पीते हैं और ज्यादा पीकर बदतमीजी करते हैं.

यही सारी बातें धर्म पर भी लागू होती हैं. हो सकता है दो पैग धर्म अच्छा हो! मैं तो वो भी नहीं मानता..! लेकिन, बहस के लिए चलो मान भी लूं, मगर दो पैग धर्म पीता कौन है? यह तो बढ़ जाता है… और फिर बदतमीजी करते हैं लोग, उल्टी-सीधी बात करते हैं… 

फिर कभी-कभी बड़े तर्क देते हैं लोग… कि भाई देखो, आप ईश्वर को, भगवान को नहीं मानते हैं. अगर आप मरे और उसके बाद मालूम हो कि ईश्वर है, तो आप तो प्रॉब्लम में पड़ जाएंगे… और अगर आप ईश्वर को मानते हैं और मर गए. फिर पता चला कि ईश्वर नहीं है, तो नहीं है. आप तो खत्म हो गए. इससे ज्यादा गलत तर्क नहीं सुना मैंने. वह इसलिए कि इन्होंने यह तय कर लिया है कि आदमी मरने के एक सेकंड पहले निर्णय करेगा कि भगवान है कि नहीं है. लेकिन, उसने निर्णय तो शुरू से किया हुआ है. वह तो सारी जिंदगी इसी तरह से गुजार रहा है. उसका हर काम, उसकी हर बात, उसकी सोच, उसका विचार, उसके संस्कार इस लाइन मे होंगे कि कोई खुदा है या नहीं है. ऐसा थोड़े है कि रख लिया जेब में. पड़ा है, काम आएगा. नहीं हुआ, तो कोई बात नहीं, फेंक देंगे. ऐसा नहीं है.

….सो, करना यह चाहिए कि १८ साल की उमर तक लड़के-लड़की को धर्म के बारे में कुछ मत बताइए. उसके बाद उससे कहिए, ‘‘बेटा, ये १० किताबें हैं… दुनिया के मुख्य धर्मों की. तुम पढ़ लो. इसमें से जो तुम्हें ठीक लगे, वह धर्म अपना लो.’’ देखिए! हमारे यहां इंजीनियर बैठे हैं, डॉक्टर बैठे हैं… एक जमाना था कि हर मां-बाप को लगता था हमारा बच्चा डॉक्टर बने या इंजीनियर बने. वह यह नहीं सोचता था कि मेरा बेटा पेंटर बने, मेरा बेटा सिंगर बने, मेरा बेटा खिलाड़ी हो जाए… कोई नहीं सोचता था. यही सोचते थे कि डॉक्टर बने या इंजीनियर बने. आज हमारे क्या संस्कार हो गए कि आप बच्चे पर जोर मत डालिए कि तुझे डॉक्टर ही बनना पड़ेगा, इंजीनियर ही बनना पड़ेगा. उसका जी चाहेगा, बनेगा; जी चाहेगा, नहीं बनेगा. अब जिस बच्चे का आप डॉक्टर या इंजीनियर बनने के लिए बचपन से ब्रेनवॉश नहीं करते, उसका आप एक धर्म के लिए ब्रेनवॉश क्यों करते हैं? …कि बेटा तू हिंदू ही बनेगा, तू मुसलमान ही बनेगा… उसे छोड़ दो… देखो, क्या बनता है वह. अट्ठारह साल की उम्र तक उसे कोई धर्म नहीं बताया आपने और फिर धर्म की किताबें दे दी, तो मैं बताता हूं कौन-सा धर्म चुनेगा वह. कोई भी नहीं. यह पक्की बात है. नहीं चुनेगा कोई धर्म…

हम हर बुरा काम अच्छे नाम से करते हैं. उसी तरह से यह जो काम है, इसे हम कहते हैं faith. यह faith क्या है? उनका faith है, हम क्या कह सकते हैं? तो faith होता क्या है? faith में और belief में क्या फर्क है? मैं यह believe करता हूं कि नॉर्थ पोल है. मैं गया नहीं कभी… मैंने देखा नहीं… लेकिन मैं मानता हूं कि नॉर्थ पोल है. क्या यह मेरा faith है? नहीं. यह मेरा faith क्यों नहीं है? यह मेरा belief क्यों है? इसलिए कि नॉर्थ पोल लॉजिकली है. अगर दुनिया गोल है, तो ऊपर कोई टॉप तो होगा उसका! होना ही चाहिए. फिर कुछ लोग गए भी हैं और देखा भी है उन्होंने. उसकी तस्वीरें भी मैंने देखी है और इतना ही शौक है, तो जाकर देख भी सकता हूं. …और अगर न भी देखूँ, तो कॉमन सेंस यह कहता है, लॉजिक यह कहता है कि गोल चीज है, तो टॉप होगा. इसलिए यह मेरा faith नहीं है, यह मेरा belief है. जिस चीज का भी कोई लॉजिक है, जिसका कोई एविडेंस है, कोई विटनेस है, कोई प्रूफ है, कोई ration है, वह faith नहीं है, वह belief है.

Faith का मतलब यह है कि न कोई सबूत हो, न कोई लॉजिक हो, न कोई गवाह हो, न कोई अकल की बात हो, फिर भी आप उसे मानें. यह है faith. अब मुझे एक बात बताइए faith में और बेवकूफी में क्या फर्क है? बेवकूफी भी यही है कि मैं एक ऐसी बात मान लूं, जिसका न कोई सबूत है, न गवाह है न कोई लॉजिक है. और मैं मान लूं. यही तो बेवकूफी है. तो faith और बेवकूफी में अंतर क्या है? बेवकूफों के नंबर का. अगर एक तरह के बेवकूफों की संख्या बहुत बढ़ जाए, तो वो faith है. कैसे?

आपको आज मेरे बारे में मालूम है. बड़ी-बड़ी बातें करता है. सांगली में आकर यह बोल रहा था, वह बोल रहा था… जब वह घर पर होता है न, तो सुबह उठकर दो घंटे ज्यूपिटर की पूजा करता है. …तो पूजा पर पहले हैरान नहीं होंगे आप. हैरान होंगे ज्यूपिटर की पूजा करने पर. अरे भाई! ज्यूपिटर की पूजा तो रोमन करते थे, जिनकी senate थी; जिन्होंने कानून बनाए थे; जिन्होंने आधी दुनिया पर कब्जा किया हुआ था और अपनी हुकूमत चलाते थे… वे रोमन ज्यूपिटर की पूजा करते थे. जहां बड़े-बड़े फिलासफर पैदा हुए थे, बड़े-बड़े जरनल पैदा हुए थे… वे लोग ज्यूपिटर की पूजा करते थे. तो अब क्या खराबी हो गई है जो मैं ज्यूपिटर की पूजा करूं तो पागल कहलाऊंगा? इसलिए कि आज मैं अकेला रहूंगा… अगर मेरे जैसे १० करोड़ और बेवकूफ हो जाएं तो फिर ज्यूपिटर की पूजा करना जायज बन जाए. तब आप एक शब्द नही बोल सकते ज्यूपिटर के खिलाफ. फिर तो आप १० करोड़ लोगों की भावनाओं को हर्ट कर देंगे. नंबर ऑफ फूल्स जो है, वो डिग्निटी देता है, बेवकूफ की बात को.

यहां स्टेज से एक बात और कहना चाहता हूं, जो बहुत ज्यादा मेरे फेवर में नहीं है. हमारा भला नहीं है उसमें शायद, लेकिन सच है. आप कम्युनलिज्म को धर्म मत समझिए. मेरा धर्म से जो गिला है, जो मैं दुश्मन हूं, उसे गलत समझता हूं और उससे दूर रहना चाहता हूँ – वो एक अलग बात. लेकिन कम्युनलिज्म जो है, उसका ऑल्टरनेटिव सेक्युलरिज्म है और धर्म का ऑल्टरनेटिव है atheism. आप कम्युनल होते हुए भी atheist और atheist हो के भी कम्युनल हो सकते हैं. यह बात जो है, वह समझने की है. 

जैसे जिन्ना नास्तिक था, वह शराब भी पीता था और सुअर भी खाता था. अच्छा, मुसलमानों का भी कमाल है, आप लोगों को एक बात बताऊँ? अपने मुसलमान दोस्तों से भी पूछिएगा. शराब पीने का परसेंटेज मुसलमानों में बहुत बड़ा है, जबकि उनके धर्म में क्या है कि तुम अगर मर रहे हो… और अब शराब ही तुम्हें बचा सकती हो, तब भी तुम नहीं पी सकते. मर जाओ, पर शराब नहीं पीना. सुअर के बारे में यह है कि अगर तीन रोज या तीन वक्त तुम्हें खाना नहीं मिला है, तो तुम सुअर का गोश्त खा सकते हो. तीन टाइम अगर सचमुच भूखे हो और तुम्हें खाने को नहीं मिल पाया तो सूअर का गोश्त खाने के लिए एक छोटा-सा दरवाजा फिर भी खुला है. पर शराब में नहीं. मगर ये शराब पीते हैं और सुअर नहीं खाते. सुअर इसलिए नहीं खाते कि उसके ऑल्टरनेटिव बहुत है. शराब का ऑल्टरनेटिव नहीं है.

…तो है क्या कि आप कम्युनल होके भी atheist हो सकते है. जिन्ना वॉज टोटल एथिस्ट. मैं नाम नहीं लेना चाहूंगा, वरना फिर हंगामा होगा. इवन हिंदू राइट विंग में दो-तीन बहुत बड़े कम्युनल लीडर्स हुए हैं, जिन्होंने पब्लिकली कहा है, जिन्होंने खुद लिखा और कहा कि हम atheist हैं. एथिस्ट होने के बावजूद आप कम्युनल हो सकते हैं. हालांकि, रिलीजियस होते हुए सेक्युलर होना बहुत मुश्किल काम है. जैसे कि गाँधीजी थे. Gandhiji was a religious person but he was secular. Maulana Azad was a religious person to such an extent that he translated the Quran in Urdu but he was a secular person. ये rare लोग हैं… वरना ज्यादातर चान्स यह है कि अगर आप ज्यादा रिलीजियस हुए, तो किसी चोर दरवाजे से कम्युनलिज्म भी आपके अंदर आ जाएगा. ये वे लोग हैं, जिन्होंने उसको नहीं आने दिया. अपने अंदर धर्म को रखा, कम्युनलिज्म को निकाल दिया. बहुत मुश्किल है और मैं राय नहीं दूंगा कि इस चक्कर में पड़ें आप. लेकिन, यह हो सकता है कि आप एथिस्ट हैं, पर सेक्युलर नहीं. आप एथिस्ट हैं और आप कम्युनल हैं… यह पॉसिबल है. इसलिए कि धर्म एक चीज़ है और कम्युनिटी दूसरी. कम्युनिटी एक पॉलिटिकल सोशल आइडेंटिटी है. आप इसके chauvinist बन जाते हैं. अपनी कम्युनिटी के आगे किसी को कुछ नहीं समझते. आपकी कम्युनिटी का जो तौर-तरीका है, इसका जो कल्चर है, इसकी जो भाषा है, वही सबसे अच्छी है. इसके जीने का तरीका सबसे अच्छा है. इतिहास में सब नेक काम इसने ही किए हैं, बाकी सब बुरे थे. ऐसा लग सकता है. बिना धर्म को माने भी आप कम्युनल हो सकते हैं. यह बात मुझे सूट नहीं कर रही है,  इसलिए कि मैं तो धर्म पर जितने इल्ज़ाम लग सके, लगाना चाहूंगा. लेकिन, सच्ची बात यही है. हमें यह नहीं समझना चाहिए कि ये जो आज कम्युनल हैं लोग, ये बड़े धार्मिक हैं. ज़रूरी नहीं. हो सकता है कि इनका फुट सोल्जर बहुत धार्मिक हो. किस्सा क्या है कि उससे कहा जाता है कि यह बात तो तुम्हें माननी है. बिना किसी लॉजिक के, बिना किसी बहस के, बिना किसी सुबूत के. उसको ट्रेन किया जाता है अंधविश्वास के लिए. अच्छा, ब्लाइन्ड-फेथ नाम की कोई चीज़ दुनिया में नहीं है. फेथ ब्लाइन्ड है. तो ब्लाइंड फेथ कहने का कोई मतलब ही नहीं है. फेथ का मतलब ही ब्लाइंड.

…तो फुट सोल्जर का फेथ है. वह जो सड़क पे आदमी है, जो झंडा लेकर चिल्लाता हुआ सड़क पर निकले. वह बेचारा, सचमुच उसका फेथ है. सेक्युलर लीडर को यह मालूम है कि कहां पर कांटा डालना है. ठीक उसी जगह जहां स्पॉट है इसके फेथ का… तो इसे फंसा सकते हैं. इसलिए कि वहां तो यह फुट सोल्जर सवाल ही नहीं करता. आम आदमी के फेथ का एक कोल्ड ब्लडेड सेक्युलर लीडर फायदा उठाता है. इस सेक्युलर लीडर का कोई principle नहीं है, इसमें कोई ईमानदारी नहीं है, फेयरनेस नहीं है. जिन्ना इज द आइडियल एक्जाम्पल ऑफ दिस. जो आम आदमी सड़क पर खड़े होकर नारा लगा रहे है, वह सच में मानता है शायद धर्म को… और यह लीडर जानता है कि इस बेवकूफ को मैंने अगर धर्म का डोज दिया, तो यह मेरे पीछे-पीछे आएगा. और मै इसे जैसे चाहूं इस्तेमाल करूँगा. लीडर बड़ा कोल्ड ब्लडेड और होशियार होता है. कोई आदमी जो वाकई बहुत ज्यादा धार्मिक हो, तो निश्चित इतना बेवकूफ है कि बड़ा लीडर बन ही नहीं सकता. बड़ा लीडर बनने के लिए चाहिए कि आप सेक्युलर हों. आपके अंदर कोई ईमानदारी के संस्कार न हों और बेईमानी से आप उन बेचारों को जो धर्म को अपना सब मानते हैं, उन्हें यूज़ करें. हमारे यहां यह बहुत कन्फ्यूजन चल रहा है कि हम इसे मिक्स करते हैं. नहीं. धर्म एक इल्लॉजिकल बात है. कम्युनलिज्म एक meanness है. यह दो अलग-अलग चीज़ हैं. यह मिक्स की जाती हैं, क्योंकि यह सूट करता है उस कम्युनलिस्ट को, ऑपर्च्युनिस्ट को. वह यूज़ कर रहा है, धर्म को. यह धर्म नहीं है. यह इसका पॉलिटिकल यूज़ है, जो गलत है.

धर्म गलत है, वह एक अलग कहानी है, अलग किस्सा है. मुझे तो समझ में नहीं आता है. आप किसी एक ऐसे आदमी से कैसे बिज़नेस कर सकते हैं, जो आपको कभी पेमेंट करता ही नहीं हो? जो हमेशा आपको पोस्टडेटेड चेक देता रहे जिसे आप कैश नहीं करा सकते हैं अपनी जिंदगी में. क्या आप उसके साथ धंधा करेंगे? पोस्टडेटेड चेक देता है धर्म. अगर आप को सूट करता है आप करते रहिए. चाहिए जितना बिज़नेस करिए. आपका पार्टनर है आपका धर्म. वह आपको देता है कि अच्छा तुमने यह किया! मेरे लिए या दुनिया के लिए? ..तो ऐसा है कि तुम जब मर जाओगे, तो स्वर्ग में जाओगे. वहां हम तुम्हें यह देंगे, वहां तुम्हें यह मिलेगा… अरे भाई यहां किया है मैंने, यहीं दे दो! पेमेंट यहां नहीं है किसी भी धर्म का. उन्होंने उसके लिए अलग स्वर्ग बना रखा है. अगर यहां पेमेंट कर सकते तो स्वर्ग बनाते काहे को? इसको देखो, इसने तुम्हारे साथ जो बहुत बुरा किया है न, नरक में जाएगा ये. नर्क में? अरे ! यहीं पर दे दो न सजा. तुम तो omnipotent हो. यह कमाल है. और हम पोस्टडेटेड चेक सारी जिंदगी लेते रहते हैं… जिनमें से एक भी कैश नहीं होता. और खुश हैं. खुश रहिए, हमको क्या? हमको पोस्टडेटेड चेक नहीं लेना.

उसकी बिना मर्जी के पत्ता नहीं हिलता. उसका टोटल कंट्रोल है. यह जो आप आसमान देख रहे हैं न, यह ग्राउंड फ्लोर है. इसके ऊपर फ्लोर से हो रहा है. सेवन फ्लोर पर जो पेंटहाउस है उसमें गॉड रहता है और वह हर चीज़, आपकी और मेरी देख रहा है. जो भी हमने किया, उसे पता है और वह सब नोट कर रहा है… एकॉर्डिंग टू अब्राहमिक रिलीजन्स. फिर जब आप मरते हैं तो एक दिन वह आपको सामने खड़ा करेगा. पूछेगा तुमने यह किया, तो अच्छा; तो तुमने वह किया था, तो इधर भेजो, इसे उधर भेजो. इस मुद्दे पर मुझे समस्या है… अगर तुम्हारी मर्जी के बिना एक पत्ता नहीं हिलता… और सब कुछ तुम देख रहे हो. और यह जो रिलीजियस लोग हैं, यह मंदिर, मस्जिद और चर्च जाकर दुआ भी मांगते हैं…. मेरे बेटे को नौकरी मिल जाए, मेरी बेटी की शादी वहां पर हो जाए… तो इसका मतलब है कि गॉड डे टु डे लाइफ में भी इंटरफेयर करता है… तो फिर यह जो दुनिया में इतना अन्याय है, दुनिया में इतनी भूख है, इतनी बीमारीयां हैं, इतनी मजबूरीयां हैं, इतने बलात्कार हैं, इतनी हत्याएं हैं…. यह इसके सामने हो रहे हैं… यह चाहे, तो रोक सकता है… लेकिन यह होने देता है…. और यह मुझसे पूछेगा? इसकी मजाल होगी कि मुझसे पूछेगा कि तुमने क्या किया दुनिया में? मैं पूछूंगा. अगर यह निकला तो. कि भाई तुमने क्या किया था? यह सुनामी में… यह छोटे छोटे बच्चे मर गए, बुड्ढे-बुढ़िया मर गए… तो उन्हें तुम बचा सकते थे? छह महीने के बच्चे को जब डिप्थीरिया होता है, तो वह नीला पड़ जाता है. सांस की नली बंद होती है, जाली आ जाती है उसमें. और वो घुटकर, नीला होकर कर मरता है. तुम देख रहे थे? इस बीमारी से जो हजारों लाखों बच्चे मरते हैं, तुम उनकी जाली नहीं हटा सकते थे? तुम्हें शर्म नहीं आती? अगर तुम हो. मैं तो फॉर गॉड सेक दुआ करता हूँ कि गॉड न हो. वरना बेचारा बहुत शर्मिंदा होगा!

सजदा करते हैं नमाज़ में. काबा की तरफ रुख करके. सीधे पहुंच जाता था. यह उस जमाने की चीज़ है, जब धरती फ्लैट थी. पर अब तो धरती गोल है, सजदा तो अब टैन्जेन्ट जाएगा न? यू आर मिसिंग काबा बाइ थाउजेंड्स ऑफ माइल्स. जमीन तो गोल है न? यह फ्लैट ग्राउंड पे ठीक था. जब तक जमीन फ्लैट थी, तब तक सजदा ठीक था. यह अब गलत है. जमीन गोल है. उधर है सऊदी अरब और तुम्हारा इधर निकल गया. तुम बैठे पूजा कर रहे होते हो. इतनी छोटी-सी एक चम्मच होती है, जिससे आपको आग में घी डालना पड़ता है…. यूनिवर्स देखा है? कितना बड़ा है!! जो नियरेस्ट स्टार है, उसका नाम है अल्फा सेंटोरी… वहां तक अगर आपको पहुंचना है, तो १८२००० मील प्रति  सेकंड चलें… और बीच में कहीं चाय पीने न रुक जाएं, तो चार साल में पहुंचेंगे… यह तो नेक्सट डोअर नेबर हैं… इतना बड़ा विस्तार है, इस कायनात का… इस सृष्टि का… कहां तक फैली है? उसमें एक डस्ट के, एक ज़र्रे के बराबर भी नहीं है धरती…. डस्ट के जर्रे के बराबर भी नहीं…. उसमें आप कितने हैं? और वह चम्मच, जिससे आप घी डाल रहे हैं वह कितनी सी? और आप इसे डालकर समझ रहे हैं कि अब पूरी सृष्टि बदलने वाली है आप के लिए!! यार, कुछ तो सोचो. मुझे जब इन्होंने इंटरव्यू किया था, रिचर्ड डॉकिन्स अवॉर्ड देते समय. पहला सवाल उन्होंने किया था कि, ‘‘व्हाय आर यू एन एथिस्ट?’’ मैंने कहा, ‘‘बिकॉज़ आई थिंक.’’ thats all. क्या है कि बच्चा जब बड़ा हो रहा होता है, उसके ब्रेन का एक हिस्सा डैमेज कर दिया जाता है. यह सब लोग, जो अपने बच्चों को धर्म सिखाते हैं, यह चाइल्ड अब्यूज में अरेस्ट होने चाहिए. वह कभी पूछता ही नहीं इस बारे में. उसकी कोई थिंकिंग ही नहीं होती कि मैं क्या मान रहा हूं. बाकी काम ठीक कर रहा होता है. यहां उसकी अकल काम ही नहीं करती. मैंने एक ट्वीट किया था, तो ट्विटरवालों ने मुझे लेटर लिखा कि आप हमको परमिशन दीजिए कॉपीराइट की; ताकि हम इसे अपनी वॉल पे यूज़ कर सके.

दुनिया का जो सबसे धार्मिक आदमी, वह भी ९०% एथिस्ट है. क्यों? इसलिए कि दुनिया में १० धर्म हैं… एक वह मानता है और बाकी ९ को बिल्कुल रैशनल होकर वैसे ही देखता है जैसे मैं देखता हूं. बाकी ९ की गलतियां उसे परफेक्ट दिखाई देती है. मुझे हिंदुओं ने भी बोला है, मुसलमानों ने भी बोला है, ईसाइयों ने भी बोला है… एक-दूसरे के धर्म के बारे में कि कैसे मानते हैं ये लोग? अरे बेवकूफ, तू क्या मानता है, यह तो देख? हमारी अकल सिर्फ अपने धर्म में आकर बंद हो जाती है. बाकी हम बिल्कुल रैशनली देखते है कि यार ये लोग क्या करते हैं? यह क्या मानते हैं? इनकी यह रिच्युअल क्या है? यह तरीके क्या हैं? सब पागलपन है… उन्हें साफ दिखाई देता है… एक बहुत ही धार्मिक आदमी में और मुझमें सिर्फ एक नंबर का डिफरेंस है, ९ में हम दोनों एग्री कर रहे हैं.

वापस चलते हैं, उस कोल्ड ब्लडेड लीडर की तरफ. आप देख रहे है कि कोल्ड ब्लडेड लोग बैठ के कैसे manipulate करते हैं उन लोगों को, जो मासूमियत में या गलती से धर्म को मान रहे हैं. उन मासूमों को कुछ नहीं मिलता है… उनको धर्म के लिए लड़ने से थोड़े ही कुछ मिल जाता है. आए दिन इस बात के तरह-तरह के सुबूत आपको मिलते हैं.

पानीपत पर बाबर ने हमला किया था. और जब उसे लगा कि वो जीत नहीं पाएगा. उधर की फौज बहुत तगड़ी है. तो उसने अपनी फौज को जमा किया. बाबर शराब पीता था. उसने शराब की बोतल ली और तोड़ दी. और कहा कि मैं आज अल्लाह के सामने कसम खाता हूं कि मैं कभी शराब नहीं पीऊंगा. आज हमें जिहाद पर जाना है…. कोई जिहाद नहीं थी… उसे बादशाह बनना था… और बाद में पी भी थी उसने…. न कोई जिहाद, न फिहाद…. यह हमेशा से होता आया है कि जो पाॅवरफुल आदमी है, वो कैल्कुलेटेड तरीके से, कलंकित तरीके से उन मासूम आदमियों को यूज़ करता है, जो सचमुच बेवकूफ हैं, जो सचमुच धर्म मानते हैं. आज भी दुनिया में जहाँ देखिए, यही हो रहा है. अमेरिका जैसे प्रोग्रेसिव मुल्क में भी हो रहा है. यह जो बाइबल बेल्ट कहलाती है, वहाँ कई स्टेट हैं, जहाँ डार्विन नहीं पढ़ाया जाता. पढ़ाने की इजाजत नहीं है. यही सारी दुनिया में हो रहा है…

यह दुनिया की, सबसे बड़ी यूनिवर्स की रियलिटी है… वह तो खुदा है…. सुप्रीम गॉड. उसके बारे में सवाल नहीं कर सकते हैं आप? अरे! उसके बारे में तो हर सवाल कर लो. वह तो परफेक्ट है!! क्या प्रॉब्लम है? जो भी इज्म हो, फिलॉसफी हो, धर्म हो, जो भी हो वो अगर आपसे कहे कि इसके आगे तुम सवाल नहीं कर सकते तो उस पर कभी भरोसा मत कीजिए. हम सवाल करने का राइट नहीं खो सकते. हमारे पास इसके अलावा कुछ है भी नहीं कि हम सवाल करते हैं. हम अगर पेड़ों से उतरकर, गुफाओं से निकलकर यहां तक पहुंचे हैं तो इसलिए पहुंचे हैं कि हम सवाल करते हैं. वरना धर्म को तो सबकुछ मालूम था. धर्म को पता था कि इजिप्ट की जो नदी है नील, उसमें बाढ़ क्यों आती है? वे कहते थे कि नील का देवता नाराज हो गया और अब हमें बलि देनी पड़ेगी. वर्जिन लड़कियां फेंकनी पड़ेगी नील में, तब वह शांत होगी. और फेंकते थे. उन्हें मालूम था. हमें नहीं मालूम था कि फ्लड क्यों आती है. हमने सवाल किया तो पता चला किस वजह से आती है. उनको मालूम था कि कोई बीमारी क्यों होती है? देवी आई है, हमें नहीं मालूम था. हमने पता लगाया तो फिर उसकी दवा बना ली. और वह बीमारी ठीक. जो कुछ दुनिया में हुआ, जो कुछ. हद तो यह है कि, पता है, रेल इंजन के बारे में पोप ने कहा था, शैतान की सवारी है. भग भग भग भग जा रहा है बेचारा… तुम्हारा क्या ले रहा है यार? पीछे डिब्बे लगा दो, आराम से जाओगे. उसके बारे में कहा था कि यह शैतान की सवारी है. इसमें बैठकर तुम सिर्फ नर्क में जा सकते हो. तो धर्म ने आपको हमेशा चीजों का पता लगाने से, चीजों को समझने से, इंसान की मुसीबतों को सॉल्व करने से रोका है. हर धर्म ने!

हममें और धार्मिक आदमी में एक फर्क है. 

पूछने पर कि क्या तुम यह जानते हो?
हम कह सकते हैं कि नहीं जानते.
यह कैसे बना? इंसान कैसे पैदा हुआ और ये कैसे हो गया?
कुछ मालूम है, कुछ नहीं मालूम.
यह लाइफ कैसे बनी?
थोड़ा मालूम है, थोड़ा पता है, थोड़ा नहीं.

पर उन्हें सब पता है. हर बात का उनके पास पूरा जवाब है. 

हमारे पास? जितना हम जानते हैं, उससे ज्यादा सवाल पैदा होते रहते हैं. हम कभी भी ऐसी जगह नहीं पहुँचेंगे जहां हमारे पास सारे जवाब हों. 

यही फर्क है. वे अपनी जहालत की पूजा करते हैं. हम अपनी जहालत से लड़ रहे हैं.

और यह फर्क हमेशा रहना चाहिए.

धन्यवाद !!

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मैं और मेरी नास्तिकता

अभिप्राय 3

  • जावेदजी,
    नास्तिकतेवरील तुमचे विचार आवडले. बाबर, जिन्ना यांची उदाहरणे वाचून आठवले की, हेलब्रोनर या विचारवंतामते चीनमध्ये माओने जरी जवळपास एक कोटी दोन लाख माणसे मारली तरी कम्युनिझम आल्यावर चीनमधील लक्षावधी गरीबांचे जीव वाचले.
    पण एक प्रश्न असा आहे की माणसाला आत्मा आहे हे नास्तिकता मानते का? मन आणि बुद्धी यांपलीकडे एक आत्मा नावाचे स्फुरण आहे जे लेखकांना, कवींना, संतांना आणि सामान्य माणसांना पण काही क्षणी जाणवते. भारतीय तत्वज्ञान असे म्हणते की आत्मा अहंते मध्ये खोल बुडल्यामुळे माणसां माणसांत, माणूस -निसर्गांत दुही माजून अनर्थ ओढवतो.
    धार्मिक आणि नास्तिक दोन्ही प्रकृतीची माणसं अशी दुही वाढवून आपली पोळी भाजून घेत समाजाला, देशाला आणि जगाला विनाशाच्या कड्यावर आणून ठेवतात.

    जलालउद्दिन रूमी, कबीर यांच्या पासून ज्ञानदेव, गांधीजी आणि गाडगेबाबा अशा अनेकांनी व्यक्ती आणि समष्टी मध्ये दरी उत्पन्न करणाऱ्या अहंतेपासून संरक्षण मिळवण्यासाठी उपाय सुचवले आहेत. देवाप्रमाणेच आत्मा कोणी पाहिलेला नाही. कदाचित “ मन सुद्ध तुझं तुला रे गड्या भीति कशाची” मधील अत्यंत शुद्ध मन हाच आत्मा असेल. पण ते प्रयत्न साध्य आहे, तसा प्रयत्न म्हणजे वस्तऱ्याच्या धारेवरून चालण्यासारखा वेडेपणा नाही असे उपरोक्त मंडळी सांगत आली आहेत.

  • Thank you JA.
    Some brilliant logic exposing “schizho-hypocrisy of the religious”
    “आपका ज्ञान और आपकी आस्था एक-दूसरे के दुश्मन हैं, और दोनों आप के ही अंदर हैं।” लेकिन, दुनिया में इतने बीमार हैं कि जो सेहतमंद है, वह पागल लगता है। हम पागल इसलिए हैं कि हमारी आस्था और हमारे ज्ञान में अंतर नहीं है। जिसकी आस्था और ज्ञान में एक कटाछनी आपस में ही है, वह ठीक है!”
    “आप किसी एक ऐसे आदमी(भगवान, अल्ला) से कैसे बिज़नेस कर सकते हैं, जो आपको कभी पेमेंट करता ही नहीं हो? जो हमेशा आपको पोस्टडेटेड चेक देता रहे, जिसे आप कैश नहीं करा सकते हैं अपनी जिंदगी में!”

  • A differing point, Javed Akhtar ji sir,
    Communists are atheist & wicked (Stalin)
    But
    I think it is very difficult (near impossible)
    for a communal person to be atheist,
    which applies to almost all Muslims,
    who are obliged to be communalists
    & directed to be provocateurs.
    History shows us from Ayodhya to Godhra that a ‘communal’ Hindu is harmless
    unless provoked.

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