‘सुधारक’ होने की सूझ

[नागपुरातील एका हिन्दी दैनिकाने सुधारक या आमच्या हिन्दी भावंडाचे केलेले मूल्यमापन खाली देत आहोत. परीक्षणकर्त्याला आमचे हेतु नेमके समजले, याचा आनंद झाला. आम्ही आमच्या मराठी वाचकांचे लक्ष परीक्षणाच्या भाषेकडे वेधू इच्छितो. हिन्दी दैनिकांची भाषा आणि मराठी दैनिकांची भाषा यांची स्वतःच तुलना करावी! —- संपादक, आजचा सुधारक आणि सुधारक]
उर्दू और हिंदी के बीच अगर खड़ी बोली पुल है तो हिंदी और मराठी के बीच देवनागरी लिपि । इस संबंध को सुधारक नाम की पत्रिका सुदृढ़ता तो प्रदान कर ही रही है, वह हिंदी में वैचारिक बहसों को एक नए विवेक के साथ संभव बनाने का ऐतिहासिक काम भी कर रही है। आइए, इस विवेकवान और बौद्धिक परियोजना के बारे में कुछ और जानें। 1888 में मराठी भाषा के एक अग्रगामी गद्य निर्माता, समाजचिंतक और शिक्षाविद् गोपाल गणेश आगरकर ने ‘सुधारक’ नाम की एक हस्तक्षेपकारी पत्रिका शुरू की थी। इसी नाम से अभी हाल में नागपुर से कुछ मराठी भाषा-भाषी बंधुओं ने एक नायाबी वैचारिक पत्रिका निकालनी शुरू की है। श्री दिवाकर द्वारा संपादित इस पत्रिका के संपादक मंडल में दि. य. देशपांडे, प्र. ब. कुलकर्णी, सुनीति देव और नंदा खरे हैं और इनकी प्रतिश्रुतिरे विवेकवाद के प्रति है। इस पत्रिका के चार अंक इस दावेदारी को विपुल स्तर पर प्रमाणित करते हैं। ऐसा नहीं कि हिंदी में लघुपत्रिकाओं के माध्यम से वर्ग–इत्यादि पर बहसें न होती हों। होती हैं और इनमें माीय चिंता धारा की महत्त्वपूर्ण परंपराओं का परिप्रेक्ष्य भी होता है। लेकिन उन बहसों ने प्रायः पद्धतिवाद का स्प अख्तियार कर लिया है1 और वहाँ भारतीय जाति से व्युत्पन्न श्रेणीबद्धता और शक्ति संरचना पर संवेदित करने वाली बहसें कम भी हैं। मुस्लिम समाज की खढ़यों पर बेबाकी३ से बात उठाने का हौसला भी कम ही दिखता है। सुधारक (मोहनी भवन, धरमपेठ, नागपुर — 440010 एक प्रति: 8 रुपए / वार्षिक 40 रुपए) पत्रिका वर्चस्व और अधीनता की समस्याओं को अधिक विश्वसनीय सामाजिक संदर्भो के परिप्रेक्ष्य में उठाती है। भारतीय समाज में क्या गतिवान है और क्या अगतिक—-इसकी गहरी छानबीन सुधारक ने करने की मंशा दिखाई है और क्या किया जाना है इसे प्रकट करने की बौद्धिक संकल्पना ‘सुधारक’ की टीम क्रियात्मक बौद्धिकता का अगर पर्याय हो जाए तो इसे गहरा इल्म है, हिंदी में सुधारक पत्रिका नकली, सतही, धुरीहीन, आडंबरपूर्ण, मूलविहीन, प्रदर्शनवादी बहसों-आलेखों की बजाय एक संवेदित और मानवीय समाज का निर्माण करने वाली मनीषा से लैस५ जान पड़ती है। (लोकमत समाचार, 12 अगस्त 2001, ‘लोकरंग’ परिशिष्टातील ‘इरादतन’ या स्तंभातून, लेखक: देवीप्रसाद मिश्र)