बचपन से ही पढ़ने-सुनने में आता है – “अमुक विषय पर विद्वानों में मतभेद है।” बारंबार कही हुई बात सच लगने लगती है। ऐसा आभास होता है कि विद्वानों का काम अपने और दूसरों के ‘मत’ में ‘भेद’ करना ही होता है!
फिर जब उम्र चुनाव में भाग लेने लायक हो जाती है, तब पता चलता है कि मत में भेद करना ही पर्याप्त नहीं! पाँचेक साल में जिम्मेदार नागरिक को अपने ‘मत’ का ‘दान’ करना होता है। और अगर अपने काम के लिए किसी तरह का शोध करना हो, तो कुछ ऐसा सिखाया जाता है – “अपना मत (‘ओपिनियन’) नहीं दो! यह बताओ कि क्या नया-ताजा खोज के लाये हो।”
यानी अपना मत बनाने के बाद उसका भेद करना सीखना होता है, जरूरत आने पर उसका दान करना होता है, फिर उसे अभिव्यक्त करने की उत्कंठा का शमन करना होता है! विद्वत्ता का यह कठिन रास्ता हर किसी के बूते का नहीं!
पर्यावरण की पत्रकारिता में भी ऐसी ही विद्वत्ता लगती है। कुछ लिखने-कहने से पहले तरह-तरह की वैज्ञानिक सामग्री जोड़नी पड़ती है। इसका लगभग सारा मौलिक शोध अंग्रेजी में होता है। उसकी भाषा इतनी कठिन होती है कि उन साधारण लोगों को भी समझ नहीं आती जो ठीक-ठाक अंग्रेजी जानते हैं। भारतीय भाषाओं में काम करने वालों की तो बात ही छोड़ दीजिए! फिर भी, जो कोई पर्यावरण को अपना विषय मानता है, उसका काम यह सब किये बिना नहीं चल सकता है। किंतु पर्यावरण एक ‘विषय’ बना कैसे?
इसकी वजह है आधुनिक उद्योग से आये प्रकृति में बदलाव! इस विनाश की व्यापक चेतना 1960-70 के दशकों में उभरी थी, हालाँकि बहुत पहले से इसकी बात कुछ लोगों ने की है। सन् 1962 में अमेरिकी जीवशास्त्री रेचल कारसन ने ‘साइलेन्ट स्प्रिंग’ (‘खामोश वसन्त’) नामक एक किताब लिखी, जिसमें बनावटी कीटनाशकों से पक्षियों और पर्यावरण को होने वाले नुकसान का वर्णन था। समाज को झकझोरने वाली इस पुस्तक ने औद्योगिक विकास की जहरीली सच्चाई को गहराई से समझाया था।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद औद्योगिक तरक्की में अपूर्व तेजी आयी थी। इसके साथ दुनिया के कई हिस्सों में औद्योगिक विकास की वजह से नये किस्म के टकराव खड़े हो गये थे। दुनिया भर में सरकारें पारंपरिक समाज से उनके जंगल, उनका पानी और उनकी जमीन छीन के उद्योगों को सौंप रही थीं। ऐसे समाज पर्यावरण पर सीधे निर्भर रहते हैं। कई जगह साधारण लोगों में अपने पर्यावरण की रक्षा के आंदोलन छिड़ रहे थे।
इसका एक जाना-माना उदाहरण है चमोली-गढ़वाल से सन् 1972 में उठा ‘चिपको आंदोलन’। ऐसे ही 1976 में नर्मदा घाटी में बन रहे बांधों के विरोध में खड़ा हुआ ‘मिट्टी बचाओ आंदोलन’। अनेक गरीब देशों में भी कुछ ऐसा ही हो रहा था, चाहे वह अफ्रीका के नाईजीरिया में पेट्रोलियम का खनन करने वाली कंपनियाँ रही हों, जिन्हें वहाँ की सैन्य सरकार का आश्रय था! या फिर दक्षिण अमेरिका के ब्राजील में अमेजॉन नदी के जंगल काटने पर रबड़ निकालने वाले मजदूरों का विरोध!
इस चेतना का एक अलग रूप भी निकलाः पर्यावरण की बरबादी रोकने के लिए दुनिया भर में कानून बनने लगे थे। भारत में वन्य प्राणियों की रक्षा का कानून सन् 1972 में बना। जंगल के बचाव का 1980 में। ‘पर्यावरण (रक्षा) अधिनियम’ 1986 में पारित हुआ। इसी साल गंगा को साफ करने की योजना भी बनी।
यूरोप और अमेरिका के अमीर देशों में वैज्ञानिक इन खतरों को और पहले से समझ रहे थे। वहाँ के साधन-संपन्न लोगों में पर्यावरण का विनाश रोकने के आंदोलन ‘साइलेन्ट स्प्रिंग’ पुस्तक के आने के बाद 1960 के दशक में खड़े हो गये थे। वैज्ञानिकों को 1980 के दशक तक यह साफ समझ आ गया था कि पृथ्वी की जलवायु बदल रही है। इसका कारण है कोयला और पेट्रोलियम जलाना, जिससे निकलने वाली कार्बन की ‘ग्रीनहाउस’ गैस सूरज की गर्मी को पृथ्वी से छूटने से रोकती हैं। इसे सिद्ध करने वाले वैज्ञानिकों का सबसे बड़ा जत्था अमेरिकी सरकार के अपने शोध संस्थानों में था, खासकर अंतरिक्ष एजेन्सी ‘नासा’ में।
अमेरिका में 1988 का राष्ट्रपति चुनाव आया। दोनों मुख्य दावेदारों ने पर्यावरण विनाश और जलवायु परिवर्तन रोकने के वादे किए। जॉर्ज बुश (प्रथम) एक बार यहाँ तक कह गये कि वे ‘ग्रीनहाउस इफेक्ट’ का सामना ‘व्हाइट हाउस इफेक्ट’ से करेंगे। यानी अगर वे चुने गये, तो राष्ट्रपति के नाते जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए जो भी करना होगा सो करेंगे। किंतु निर्वाचित होते ही उनका रुख बदल गया। उनके सलाहकारों ने उन्हें बताया कि कोयला और पेट्रोलियम रोकने से अर्थव्यवस्था धीमी होगी, नये राष्ट्रपति की छवि बिगड़ेगी।
‘व्हाइट हाउस’ में अपने चार साल के कार्यकाल में उन्होंने जलवायु परिवर्तन पर जरूरी कदम तो नहीं ही उठाये, अपने वैज्ञानिकों पर दबाव डाला कि वे अपने शोध के डरावने नतीजों की लीपा-पोती करें, उन्हें नरम कर के बताएँ। यानी झूठ बोलें!
यह रवैय्या उजागर हुआ जून 1992 को ब्राजील के रियो डी जानेरो नगर में हुए शिखर सम्मेलन में। इतनी बड़ी बैठक कभी संयुक्त राष्ट्र ने इससे पहले रखी नहीं थी। इसमें 172 राष्ट्रीय सरकारों की ओर से निर्णय लेने वाले नेता शामिल थे। उम्मीद यही थी कि सभी देश मिल-जुल के ऐसे कड़वे-किंतु-जरूरी फैसले लेंगे जिनसे मनुष्य का सामूहिक विनाश रुक जाएगा।
किंतु राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने उस सम्मेलन में कहा कि वे अमेरिका की रईस जीवनशैली पर समझौता नहीं करेंगें। उन्होंने अपने ही वैज्ञानिकों को धता बता दिया! अमेरिका की घरेलू राजनीति सारी दुनिया के भविष्य पर भारी पड़ी! दुनिया के सबसे ताकतवर देश ने अपने-आप को बाकी दुनिया से अलग कर लिया था।
इसके बाद राजनीति और उद्योग की साँठ-गाँठ ने पर्यावरण संरक्षण पर धावा बोल दिया। जैसे-जैसे सभी प्रमाण बताते गये कि निसर्ग की बरबादी का कारण औद्योगिक विकास है, वैसे-वैसे उद्योग के प्रायोजित संस्थान उसका छिद्रान्वेषण करने लगे! उद्योग ने झूठ का सहारा लेते हुए तथ्यों को उधेड़ने का काम किया।
पूरी पृथ्वी की जलवायु को समझना आसान नहीं है। तथ्यों में अक्सर विरोधाभास मिलता है, जिसे समझने और सुलझाने में लंबा समय लगता है। कोयले और पेट्रोलियम में डूबे उद्योगों ने बार-बार यह कहना शरू किया कि विज्ञान की दुनिया में पर्यावरण विनाश और जलवायु परिवर्तन को ले के अलग-अलग धारणाएँ हैं। बार-बार दुहराई हुई बात हमें सच लगती है। साधारण समाज में संदेश यही गया है कि पर्यावरण विनाश पर विद्वानों में मतभेद है!
रियो 1992 में तीन अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ हुई थी। एक, जलवायु परिवर्तन रोकने की। दो, जीवों की विविधता यानी ‘बायोडाइवर्सिटी’ के संरक्षण की। तीन, बढ़ते हुए रेगिस्तानों को रोकने की। तीनों समझौतों के अंतर्गत जो काम होना था वह नहीं हुआ है। जब कभी इनकी बातचीत होती है, तब सभी देश अपने सबसे योग्य विद्वानों को भेजते हैं।
इन लोगों का काम इतना भर होता है कि नैतिकता का बोझ दूसरों पर डालें, अपने देश पर कोई भी जिम्मेदारी लेने से बचें। ये लोग तरह-तरह के शास्त्र में पारंगत होते हैं। असल में कुछ भी करने की बजाय ये कर्म की नैतिकता पर धाराप्रवाह बोल सकते हैं! इससे पर्यावरण की बातचीत ‘परउपदेश की नैतिकता’ में अटक गयी है।
इस दलदल से निकलने का कोई रास्ता आज नजर नहीं आता। सारी दुनिया में राजनीति का सबसे अधिक चंदा उन्हीं उद्योगों से आता है जिन पर पर्यावरण विनाश का सबसे बड़ा जिम्मा है। उद्योग के चंदे से ही चुनाव लड़े जाते हैं। किंतु राजनेता जब सरकार की सत्ता पा जायें, तब उन्हें वैज्ञानिकों को भी बरतना पड़ता है। दूसरे देशों की सरकारों के साथ चर्चा करनी होती है! और चुनाव के समय साधारण लोगों का सामना तो करना ही होता है!
इन अलग-अलग मंडलियों के लोगों को पटाने के लिए सियासत ने तरह-तरह की जुबान अख्तियार की है। पहली भाषा उद्योग और अपने सलाहकारों के लिए है, जिसमें राजनीति की सौदेबाजी होती है। दूसरी भाषा है कूटनीति की, जिसमें दूसरे देशों के साथ मोल-भाव किया जाता है, उन्हें हड़काया जाता है, या उनकी चापलूसी की जाती है। तीसरी भाषा साधारण लोगों को तसल्ली देने की है, यह जताने के लिए है कि राजनेता ही लोगों के सच्चे हितैषी हैं, कि वे हर समस्या के समाधान के लिए कोई ‘मध्य मार्ग’ निकाल लेंगे। चौथी भाषा है वैज्ञानिकों के लिए, जिसमें उन्हें बताया जाता है कि वे जो माँग कर रहे हैं वह व्यवहारिक नहीं है – और जिसमें विद्वानों में मतभेद ऐसे दिखाया जाता है जैसे मुर्गे लड़ाये जा रहे हों!
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भाषाएँ पीढ़ियों में बनती हैं। ये आसानी से बदलती नहीं हैं। हम जो कुछ नया जान पाते हैं, उसे समझने-समझाने के लिए पुरानी जानकारी का सहारा लेते हैं। किसी नये आकार को नापने के लिए उसे पुराने फुट्टे के साथ रख के नापते हैं।
नये पैमाने आसानी से चलते नहीं हैं। फ्रांस में 1789 की क्रांति के बाद सभी तरह के माप-तौल को ‘वैज्ञानिक’ दशांश पद्धति पर डालने का आग्रह हुआ। (उसी से किलोमीटर और किलोग्राम के माप निकले, जो आज हमारे यहाँ तो चलते हैं किंतु अमेरिका और ब्रिटेन में नहीं चलते हैं।) समय का माप भी दशांश से किया गया, पुरानी काल गणना हटा दी गयी। यानी…साठ सेकेंड का एक मिनट, साठ मिनट का एक घंटा, चौबीस घंटे का एक दिन, सात दिन का एक सप्ताह…
इस सब को हटा के काल गणना की एक ‘वैज्ञानिक’ पद्धति लागू की गयी। किंतु इस नये समय से इतनी परेशानी आयी कि इसे दो साल के भीतर हटाना पड़ा। आज फ्रांस में भी वही ‘दर्जन’ पर आधारित काल गणना चलती है जिसे पाँच हजार साल पहले सुमेर साम्राज्य में माना जाता था (और जहाँ पर आज इराक है!)।
नये-पुराने का यह अर्थ-अनर्थ समझने के लिए परमाणु शक्ति का उदाहरण लीजिए। भौतिकशास्त्र में कई वैज्ञानिकों के शोध के बाद 20 वीं शताब्दी के पहले हिस्से में अणु और परमाणु की प्रामाणिक समझ हमें मिली। किंतु इस नये ज्ञान की परिभाषा गढ़ने के लिए जो शब्द इस्तेमाल हुए वे प्राचीन यूनानी (‘एटम’) और लातीनी (‘न्यूक्लियस’) से थे। यानी ये विचार इन भाषाओं में इतने पुराने हैं, चाहे उनका नया अर्थ बदला हुआ ही क्यों न हो!
नये प्रमाणों को ओढ़े हुए ये पुराने शास्त्रीय शब्द धीरे-धीरे ज्ञान के संसार में फैलने लगे। किंतु इनका उपयोग आज भी शास्त्रीय घेरों में सीमित है। साधारण लोगों में इस ज्ञान की उपयोगिता बताना मुश्किल है, चाहे वे सब अणु-परमाणु से ही बने हों!
यह नया ज्ञान जब भारत आया, तब इस विचार के लिए शब्द भारतीय भाषाओं में भी पहले से मौजूद थे। ‘अणु’ और ‘परमाणु’ जैसे शब्द हमारे प्राचीन शास्त्रीय दर्शन से निकले हैं। नास्तिक परंपरा के जैन और बौद्ध शास्त्र में इनका उल्लेख मिल जाता है, आस्तिक परंपरा के वैशषिक और न्याय शास्त्र में भी। वहाँ ये बातें कहाँ से आयी होंगी? ऐसे जटिल विचार किसी शून्य से तो नहीं आते! यह मान सकते हैं कि प्राचीन काल में लिखे जाने के पहले भी ये विचार लोगों को आये होंगे! न जाने कौन-कौन सी भाषाओं में! न जाने किस-किस जगह पर! किंतु उसके प्रमाण आज मौजूद नहीं हैं।
बीते समय से हमें वही पता चलता है जिसकी स्मृति किसी कारण से बच गयी हो, जिसका कोई प्रमाण बच गया हो। किंतु अतीत में प्रकृति की हर रचना का प्रमाण आज मिलता नहीं है। प्रकृति में जो कुछ बनता है, उसका समय पूरा होने पर वह अपने मूल तत्वों में विसर्जित हो जाता है। उसके अस्तित्व के ज्यादातर प्रमाण मिट जाते हैं। आधुनिक विज्ञान का चाहे जितना विकास हुआ हो, उसकी दुनिया अनिश्चितता में ही रहती है। हुनरमंद वैज्ञानिक अक्सर उन्हीं बातों से मुखातिब होते हैं जो अनजानी हैं। प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री रिचर्ड फाइनमॅन ने एक बार विज्ञान को “अज्ञानता का एक संतोषजनक दर्शन” बताया था। उनका आशय यही था कि अपने अज्ञान और अनिश्चय को स्वीकार किये बिना हम कुछ भी नया जान नहीं सकते!
विज्ञान की भाषा अपने अनिश्चिय को माप के गणित में बदलती है। “फलाँ बात के होने की अमुक प्रतिशत संभाव्यता है” – इस पद्धति में ही विज्ञान की बात होती है। चाहे जितने भी तथ्य हों, चाहे जितने प्रत्यक्ष और सांख्य प्रमाण हों, विज्ञान का काम अनुमान और उपमान के बिना नहीं चलता है।
वैज्ञानिक जिस भाषा में बात करते हैं, उसमें महीन बातों को विस्तार से बताया जाता है। हर बात के पीछे के प्रमाण बारीकी से सामने रखे जाते हैं। हर प्रमाण में सही-गलत की गुंजाइश खोली जाती है। शास्त्रीय ज्ञान की भाषा दूसरे शास्त्रियों से बात करने के लिए ही बनती है। पढ़ने वालों से अपेक्षा यही होती है कि वे हर बात को संदेह से देखेंगे, हर बात के विविध पक्षों का परीक्षण करें, उसे सिद्ध करने का आग्रह करें, ताकि हर संदेह दूर हो सके।
सामाज में साधारण लोग ऐसे बात नहीं करते। उनकी बातचीत संदेह पर नहीं, सहज विश्वास पर टिकी होती है। खुद वैज्ञानिक अपने घर-परिवार के बच्चों को मन-गढ़ंत कहानियाँ सुनाते हैं। कहानी सुनाने की शर्त यही होती है कि सुनने वाला अपनी सभी शंकाएँ हटा दे, सुनाने वाले पर भरोसा करे़! यह करते वक्त वह अपनी नादानी कुबूल करता है। फिर चाहे उस कहानी में हाथी उड़ान भरें, या सूरज पश्चिम से उग आये!
हमारी समझ, हमारा बोध कथाओं के ताने-बाने से ही बनता है। प्रसिद्ध जीवशास्त्री स्टीफन जे गूल्ड ने एक बार कहा था कि मनुष्य एक ऐसा नर-वानर गण है जो कहानियाँ सुनाता है! यह इशारा था कि हम सभी अपनी-अपनी कल्पना के फुट्टों से सृष्टि को नापते हैं। सहज रूप से हमारी समझ में यथार्थ की मात्रा बहुत कम होती है, कथाओं की अत्यधिक।
आज विज्ञान के पास हमारे मस्तिष्क को समझने के कई नये यंत्र हैं, जिनसे मगज का नक्शा बन सकता है। इनसे लगातार यही पता चल रहा है कि सूक्ष्म सत्य को समझना हमारे बस का नहीं है। ऐसा नहीं है कि कोई वास्तविकता है ही नहीं! बस, उसे जानने-समझने का हमारा सामर्थ्य सीमित है। अकबर इलाहाबादी ने लिखा है – “सदियों फिलॉसफी की चुनाँ-और-चुनीं * रही / लेकिन खुदा की बात जहाँ थी वहीं रही” (*अगर-मगर)।
अगर कोई सत्य में निष्ठा रखता है, सच जानने का व्रत रखता है, तो उसे पहले अपने अज्ञान को स्वीकार करना आवश्यक है। कहानियाँ सुन-सुन के ही हम सत्य की अपनी-अपनी धारणा गढ़ते हैं, अपनी कल्पना के सहारे! ऋगवेद के ‘नासदीय सूक्त’ में मनुष्य की शाश्वत अवस्था का सुंदर वर्णन है। इसका एक सरल अनुवाद ‘भारत एक खोज’ नामक टी.वी. कार्यक्रम के मुखड़े में था – “…सृष्टि का कौन है कर्त्ता, कर्त्ता है वा अकर्त्ता…वह ही सचमुच में जानता, या नहीं भी जानता, यह किसी को नहीं पता, नहीं पता, नहीं है पता…”
गहन-गाढ़े शास्त्र में ही नहीं, सहज सामाजिक बातचीत में भी इस सचेत अज्ञान का बोध दिखता है। पुरानी बोलचाल में इसकी स्वीकारोक्ति बात-बात में होती थी। लोग तकिया-कलाम की तरह कहते थे – “राम जाने”, “रब जाने”, “अल्लाह जाने”, “दाता जाने” … यानी सब-कुछ जानने का जिम्मा ईश्वर पर है, मनुष्य पर नहीं।
हमारे देखने-सुनने में आने वाला अधिकतर शास्त्रीय ज्ञान राज्य के आश्रय से निकलता है। हर राज्य को समाज पर अपना नियंत्रण बनाने के लिए शास्त्र और शास्त्रियों की जरूरत होती है। एकदम वैसे ही, जैसे शस्त्र और शस्त्र चलाने वाले सैनिकों के बिना कोई राजतंत्र चल ही नहीं सकता है। शास्त्र और राज्य का संबंध पुराना है। चाहे प्राचीन भारत में विहार-मठ से बने नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय रहे हों! चाहे यूरोप में चर्च की बनायी अनेक मॉनेस्ट्री रही हों, जो आज ऑक्सफोर्ड, केम्ब्रिज और हाइडलबर्ग जैसे विश्वविद्यालयों में तब्दील हो गयी हैं! या मध्यकाल में मोरॉक्को में बने अल-करवियाँ जैसे इस्लामी जामिया-खानकाह ही क्यों न हों!
आज नये विश्वविद्यालय उद्योगपति घरानों के चंदे से खड़े होते हैं। अमेरिका ही नहीं भारत में भी! इन घरानों की धन-दौलत राजाश्रय और शास्त्रीय ज्ञान से जुड़ी है। उद्योग और राजनीति के प्राचीन संबंध का यह एक नया आयाम है। उद्योग के मूल साधन पर्यावरण से आते हैं, जिन पर नियंत्रण राज्य की लाठी का होता है! लोहे जैसे धातु और कोयला-पेट्रोलियम जैसे ईंधन खनिज तो हैं हीं। जंगल और खेतों की जमीन उद्योग को सौंपना राज्य का जिम्मा रहा है। शास्त्रीय परंपराएँ राज्य और उद्योग से आश्रय पाती हैं। अगर वे इन्हीं की सेवा करें, तो कोई अचरज नहीं! शास्त्रीय लोगों की बातचीत और लिखना-पढ़ना दूसरे शास्त्रियों के लिए होता है, सहज-साधारण लोगों के लिए नहीं।
परिवार की तरह ही समाज नैसर्गिक संस्था है, उसका अस्तित्व किसी शास्त्र या शास्त्रीय ज्ञान पर टिका नहीं है। प्रकृति में अनेकानेक जीव और वनस्पति समाज-परिवार में रहते हैं। हर व्यक्ति का लालन-पालन परिवार-समाज में होता है। हम अपने जनम और परवरिश के हिसाब से अपना-पराया तय कर लेते हैं। चाहे वह धर्म से हो, जाति से हो, नस्ल से हो, भाषा से हो, कुलीनता से हो…
समाज भी अपने शास्त्र गढ़ते हैं। किंतु अपने लिए किये हुए काम अलग होते हैं! समाज के शास्त्र में अपनापन होता है। उसकी भाषा, उसकी भाव-भंगिमा राजाश्रय से उपजे शास्त्र से भिन्न होती है। राज्य का आधार बलात् शक्ति है, उसके शास्त्र प्रजा पर नियंत्रण रखने के लिए बनते हैं। साधारण लोग चाहे ऐसी शक्ति और शास्त्र के सामने झुक जाएँ, पर इसकी जबरदस्ती के सामने वे असहज रहते हैं।
जो अपनेपन के माहौल में बड़ा होता है, उसकी जड़ें होती हैं, वह सहज होता है। उसमें पाखंड और आडंबर की इच्छा कम होती है। किंतु वह अपने स्थान पर सीमित भी होता है। अपने कुएँ का मेंढक हो जाता है! इसीलिए सामाजिक व्यवहार में अपने-पराये का भाव अक्सर इतना तेज रहता है, चाहे उसका स्वरूप बदलता क्यों न रहे। सामाजिक जीवन में बदलाव आ ही नहीं सकते, ऐसा नहीं है। आते ही हैं! अपनी जरूरत जितना सहज ज्ञान लोग व्यवहार से हासिल कर लेते हैं। सामाजिक ज्ञान और समाज के शास्त्र पीढ़ियों के अनुभव से बनते हैं। इसमें देश-काल के अनुसार धीरे-धीरे बदलाव तो आते हैं। फिर भी, समाज मूल है, आसानी से बदलता नहीं है!
राजाश्रय पर टिकी शास्त्रीय दुनिया इससे अलग है। वह राजसत्ता के अनुसार बदल सकती है। अगर पूंजीवाद अपना शास्त्र बनाता है, तो साम्यवाद अपना। अगर राजवंश अपना शास्त्र गढ़ते हैं, तो गणतंत्र अपने। जो भी राज करने लगता है वह अपना औचित्य स्थापित करने वाले ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देता है।
समाज की सभी बातचीत सहज ही हो, ऐसा नहीं है। आखिरकार राज्य चलाने वाले राजनेता भी किसी परिवार में ही पैदा होते हैं! उनकी परवरिश भी किसी समाज में ही होती है! पर सामाजिक संबंधों का कोई एक शास्त्र, कोई एक आचार संहिता नहीं है। न कोई एक राजनीतिक सिद्धांत ही! समाज के स्वरूप विविध हैं, सामाजिक संबंध भी विविध हैं।
राजनीति का आग्रह होता है कि हर व्यक्ति अपना औचित्य राज्य से ही पाये! हर किसी का मुख्य संबंध अपने राज्य से ही हो! आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था ने राज्य की ताकत को अत्यधिक बढ़ाया है। राज्य और आधुनिक उद्योग का विकास तभी हो सकता है जब समाज की शक्ति घटे। कोयले और पेट्रोलियम से चलने वाला विकास राज्य-केंद्रित है, चाहे उसके राजनीतिक सिद्धांत कुछ-भी हों – साम्यवादी या पूंजीवादी, परंपरावादी या क्रांतिकारी, पर्यावरणवादी या उद्योगवादी!
राजसत्ता की धर्म और धर्मशास्त्र पर नियंत्रण में विशेष रुचि रहती है। धार्मिक निर्देश से प्रजा पर और अधिक नियंत्रण रखा जा सकता है। यह बात कई विद्वान समझा चुके हैं कि जैसे राज्य को मनुष्य ने बनाया है, वैसे ही सभी शास्त्रों और धर्मों को भी मनुष्य ने ही बनाया है, उस ईश्वर या सृष्टि ने नहीं जिसने मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनाया है!
इतिहास में राज्य द्वारा धर्म के उपयोग के अनेक प्रमाण मिलते हैं। प्राचीन रोमन साम्राज्य के शासकों ने पैगंबर ईसा को अपराधी बता के सूली पर चढ़ाया था! प्राचीन यूनान और रोम के देवी-देवताओं को मानने वाले नीरो जैसे रोमन शासक ईसाइयों को यातना देने के लिए कुख्यात थे। फिर चौथी सदी में कॉन्सटॅन्टाइन नामक एक रोमन शासक ईसाई हो गये। कुछ सालों में ही पूरा रोमन साम्राज्य ईसाई हो गया। इसके बाद राजसत्ता ने यूरोप के साधारण लोगों पर ईसाई हो जाने की जबरदस्ती की, जिसमें वह सफल हुई।
आज भी यूरोप की तीन-चौथाई आबादी ईसाई है। सदियों से राज्य और चर्च के दबाव के कारण लोग अपने पुराने धर्म और देवी-देवताओं को भूल चुके हैं। उन देवी-देवताओं को भी जिनको पूजते हुए प्राचीन यूनान और रोम के साम्राज्य बने! ईसा को यातना दे-दे के उनकी हत्या करने वाला रोमन साम्राज्य खुद ईसाई हो गया! रोमन राज्य को ईसा के प्रेम और करुणा के संदेश से मतलब नहीं था। उसे अपने साम्राज्य पर नियंत्रण रखने वाला धर्म चाहिए था!
हमारे यहाँ भी ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं। इसकी चर्चा सुनने में आती है कि मुसलमान शासकों और इस्लाम के शास्त्र के असर में लोग मुसलमान हुए। ब्रिटिश शासन में राज्य का आश्रय ईसाई शास्त्र और मिशनरियों के साथ था, जिससे लोग ईसाई भी हुए और सभी नगरों के केंद्रीय हिस्सों में चर्च को जमीन भी मिली। राज्य और धर्म का यह संबंध केवल इस्लाम या ईसाई पंथों में ही नहीं है। इसके हिंदू उदाहरण भी मिलते हैं।
आज जिसे हम मणिपुर राज्य कहते हैं, वहाँ के एक राजा लगभग तीन सौ साल पहले एक वैष्णव के प्रभाव में आये थे। अचानक राज्य का आश्रय वैष्णव पंथ को चला गया, हालाँकि वहाँ ‘सनमाही’ जैसे पारंपरिक धर्म थे, अपने शास्त्र और अपने देवी-देवता भी। फिर ब्रिटिश राज के दौरान मणिपुर में ईसाई प्रचार भी हुआ। आज औसतन दस में से चार मणिपुरी लोग वैष्णव हैं, चार ईसाई हैं, और सिर्फ दो लोगों का सनमाही जैसे अपने पुराने धर्मों में विश्वास बचा है। प्राचीन भारत से भी राज्य के आश्रय में धर्म और शास्त्र बनने के उदाहरण मिलते हैं, फिर चाहे वे वेद को मानने वाले आस्तिक धर्म रहे हों या वेद को नकारने वाले नास्तिक धर्म!
यह आज के अखबार और मीडिया पर भी लागू होता है। जो कोई राज में आता है उसकी यह इच्छा सदा ही रहती है कि प्रचार-प्रसार के साधन उसके अपने शास्त्र के हिसाब से चलें, उसका गुणगान ही करें! कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने 1975 में लगी इमरजेन्सी के बारे में कहीं लिखा है – “बदल जाते हैं वे / सरकारों के बदलाव के साथ / हाथ सरकारों के पक्के हैं / इसलिए अखबार बेचारे / कच्चे हैं”!
इतिहास में कई शक्तिशाली साम्राज्य हुए। उनके आश्रय से बहुत सारा शास्त्रीय ज्ञान निकला। लेकिन हर साम्राज्य समय के साथ मिट गया! सातवीं शताब्दी में चीन में ‘तांग’ वंश का राज शुरू हुआ। उसके आश्रय में ऐसे कई वैज्ञानिक आविष्कार हुए जिनकी नींव पर आधुनिक विज्ञान खड़ा है – बारूद, दिशासूचक ‘कम्पास’, कागज, छपाई और घुड़सवारी के लिए धातु की रकाब!
इसके कुछ समय बाद ही ज्ञान-विज्ञान का बहुत बड़ा संगम नौवीं शताब्दी के अरब साम्राज्य की राजधानी बगदाद में हुआ, विशेषकर ‘अब्बासी’ वंश के आश्रय में। इस दौर में भारत से आये गणित और पंचतंत्र की कहानियों का अरबी अनुवाद हुआ, जिससे ‘अरेबियन नाइट्स’ निकली। साथ ही प्राचीन यूनान और इटली के उन शास्त्रों का अनुवाद और पुनरजीवन भी हुआ, जिन्हें ईसाई प्रभाव में यूरोप के शासकों ने नष्ट कर दिया था।
यह सब तब रुक गया जब तक मंगोल सेनाओं ने चीन और अरब के साम्राज्यों को हरा दिया। लाखों-करोड़ों की संख्या में मुसलमान, ईसाई और बौद्ध साम्राज्यों में रहने वाले लोगों का विनाश मंगोल अभियानों में हुआ। मंगोल साम्राज्य के संस्थापक चंगेज खान पारंपरिक मंगोल धर्म ‘टेंगरी’ में विश्वास रखते थे और धार्मिक मामलों में उदार और सर्वग्राही थे। मंगोल शासकों ने जो बनाया उससे बड़ा जमीनी साम्राज्य आज तक कोई दूसरा नहीं हुआ। (ब्रिटिश साम्राज्य इससे बड़ा था पर वह नौसेना की ताकत से समुद्र के पार बना था।) मंगोल साम्राज्य की सड़कों से होता हुआ भारत, चीन और अरब संसार का ज्ञान यूरोप पहुँच गया।
यूरोप के बसाये अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे राष्ट्रों की सामरिक शक्ति आज असीम है। इसके ठीक उलट अरब और मंगोल संसार में आज ऐसा कोई राष्ट्र नहीं है जो पारंपरिक और आधुनिक विज्ञान को जोड़ के साध सके, या इसकी इच्छा भी रखता हो। भारत और चीन अब तक यूरोप की गुलामी से हुए नुकसान से उबरने में लगे हैं।
इतिहास की बातों में यह ध्यान नहीं रहता कि बड़े-से-बड़े साम्राज्य का शास्त्रीय ज्ञान उसके वैभव को अजर-अमर नहीं बना सका! यह नये ‘साइन्स’ या आधुनिक विज्ञान पर भी लागू होता है। अमेरिका की अपार सैन्य और औद्योगिक ताकत की वजह से बीसवीं शताब्दी को ‘अमेरिकी सदी’ कहा गया है। इसके पीछे जो ज्ञान लगा है, वह दुनिया भर से अमेरिका पहुँचे वैज्ञानिकों का है, खासकर जर्मनी की नाजी सरकार के अत्याचार से भागे हुए यहूदी भौतिकशास्त्रियों का, जिनकी सूझ-बूझ से अणु बम बना!
अमेरिकी सरकार के अपने वैज्ञानिक संस्थान आज पर्यावरण के विनाश और जलवायु परिवर्तन के खतरों से सभी को आगाह कर रहे हैं। किंतु उसी विज्ञान की ताकत पर खड़ी हुई अमेरीकी सरकारें इसकी उपेक्षा कर रही हैं! राजसत्ता को वही शास्त्रीय ज्ञान सुहाता है जो उसकी ताकत बढ़ाये। मर्यादा में बाँधने वाला शास्त्र राजसत्ता को कतई नापसंद है!
राज्य की शक्ति का प्रत्यक्ष रूप लोगों के लिए पुलिस और सेना का होता है। हमारे यहाँ एक कहावत चलती है – “दरोगा से न दोस्ती अच्छी न दुश्मनी ही”! मध्यकाल के कवि रहीमदास ने लिखा है – “रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली ना प्रीत”।
बहुत-से लोगों को यह पता नहीं है कि अब्दुल रहीम खान-ए-खाना अपने समय की सबसे ताकतवर मुगलिया फौज के सेनापति तो रहे ही थे, बड़े सूबेदार भी थे और फारसी, संस्कृत और अरबी समेत कई भाषाओं और विधाओं के शास्त्रीय विद्वान भी। उनकी शक्ति या ज्ञान की स्मृति समाज में नहीं है, यह भी नहीं कि दिल्ली की मथुरा रोड पर उनका बड़ा मकबरा है। लोक स्मृति में वे केवल रहीमदास हैं, एक नायाब कवि जो मनुष्य की शाश्वत अवस्था पर सटीक बातें सुंदर छंद में कह गये!
रहीम की स्मृति यही दिखाती है कि ज्ञान-विज्ञान का कितना भी विकास क्यों न हो, मनुष्य की शाश्वत अवस्था बदलती नहीं है! आज भी वही उम्मीदें हैं और वही डर हैं जो पहले थे! वही आस्था भी है और वही अंधविश्वास भी! वही धोखे हैं और वही त्याग! वही वीरता और वही कायरता! इन सबका वर्णन जैसा पुराने महाकाव्यों में मिलता है वैसा ही आज हम अपने आस-पास देख सकते हैं। तभी तो इन महाकाव्यों का मंचन आज भी टी.वी.-फिल्मों में होता है!
आदि काल से शास्त्रीय विद्वानों में मतभेद चल रहा है कि यह सृष्टि किसने बनायी। कब और कहाँ बनायी? कैसे बनायी? क्यों बनायी? समय के साथ मसला सुलझा नहीं, और पेचीदा ही हुआ है!
आज विज्ञान के पास गजब की दूरबीनें हैं, माइक्रोस्कोप हैं। इनसे अंतरिक्ष से ले के अपने शरीर की कोशिकाओं तक की छान-बीन की जा सकती है! सत्य को स्थापित करने के कई नये प्रमाण हैं। असंख्य यंत्र हैं, उनसे मिली सुविधाएँ हैं! नये-पुराने अनेक फुट्टे हैं, जिनसे हम वह भी नाप लेते हैं जिसका पहले खयाल तक न था!
फिर भी हम अपनी सीमाओं से मुक्त नहीं हो सके! यह आज भी कोई नहीं बता सकता कि यह सृष्टि किसने बनायी, क्यों बनायी! इतना तो कह ही सकते हैं कि सृष्टि इसलिए नहीं बनी कि हमारी समझ में सुविधाजनक रूप से समा जाए!
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पुरानी बोल-चाल और लिखाई में ‘पर्यावरण’ शब्द नहीं मिलता है। किंतु इसकी चिंता इतनी नयी नहीं है। मनुष्य इसका विचार सदा से करता रहा है। दुनिया भर के कथा साहित्य में प्रलय और प्राकृतिक आपदाओं का वर्णन है – बाढ़, भूचाल, अकाल, बादलों का फटना, आग बरसना, सूरज का ओझिल हो जाना…!
‘भागवत् पुराण’ में बालक कृष्ण द्वारा इन्द्र के मानमर्दन की कथा मिलती है। इसमें इन्द्र अपने अपमान का बदला लेने के लिए एक सप्ताह तक बारिश करता है, ब्रज में बाढ़ आ जाती है! इन्द्र का एक पुराना नाम है ‘पुरंदर’। इसका अर्थ है ‘नगर का विध्वंसक’। कृष्णलीला में कालिया नाग द्वारा यमुना नदी को प्रदूषित करने की कथा भी आती है। हमारे कई शास्त्रीय ग्रंथों में ‘कलयुग’ की बात कई तरह से मिलती है। कलह और पाप की इस अवधि के अंत में सृष्टि के विनाश की कल्पना है, जिसके बाद सृष्टि फिर से बनेगी।
दुनिया भर की अनेक परंपराओं में यह आता है कि सृष्टि एक शुद्ध रूप में बनी थी, और धीरे-धीरे उसका पतन हो रहा है, वह प्रलय की ओर जा रही है! प्राचीन यूनान में इसे ‘ऐपोकाटास्टैसिस’ कहा गया, जिससे ‘एपॉकैलिप्स’ शब्द बना है, जिसका अर्थ है प्रलय। एकेश्वरवाद का एक पुराना पंथ ईरान से माना जाता है, जिसे आज हम ‘पारसी’ या ‘जरथ्रुष्टी’ कहते हैं। इसमें समय के अंत की अवस्था को ‘फ्राशो केरेती’ कहा गया है। इसके पीछे मान्यता यह है कि इस प्रलय के बाद ईश्वर – जरथ्रुष्टीयों के लिए ‘अहूर मज्द’ – बुराई का नाश करेंगे, सृष्टि का जीर्णोद्धार करेंगे।
यहूदी, ईसाई और इस्लाम जैसे इब्राहिमी पंथों में इसकी कल्पना अपने-अपने तरीके से की गयी है। यहूदी इसे ‘शूव’ कहते हैं। ईसाई इसे लातिनी में ‘दिएस यूदीची’ और अंग्रेजी में ‘जजमेंट डे’ कहते हैं। मुसलमान इसे अरबी में ‘यौम अल हिसाबी’ कहते हैं, फारसी में ‘रोज़-ए-कयामत’ और उर्दू में ‘जुज़ा का दिन’।
उत्तरी यूरोप के पुराने ‘नॉर्स’ पंथ में सभी देवताओं समेत पूरी सृष्टि के विध्वंस और डूबने के चरण को ‘राग्नारोक’ कहा गया है। अमेरिका की पुरानी ‘माया’ सभ्यता के शास्त्र को कुछ लोगों ने यूँ समझा कि 21 दिसंबर 2012 को प्रलय आने वाला है, जिस वजह से कई जगह अफरा-तफरी मची।
यह विचार आधुनिक विज्ञान में भी है, जिसे ‘एन्ट्रोपी’ कहते हैं। (‘साइन्स फिक्शन’ यानी वैज्ञानिक कथा साहित्य में असंख्य किताबों का प्रकरण प्रलय के बाद की दुनिया में रखा जाता है, जिनके आधार पर हर साल बीसियों फिल्में और टी.वी. श्रृंखलाएँ बनती हैं।) प्रलय की आशंका के, कल्पना के अनेक उदाहरण जगह-जगह मिलते हैं।
आज का पर्यावरण संकट इसी फुट्टे से नापा जा रहा है। केवल एक बड़ा अंतर है। यह महाकथा किसी की कल्पना या महाकाव्य से नहीं है। इसके प्रमाण दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हुए आधुनिक विज्ञान के शोध से निकले हैं। अनेक पशु-पक्षी और वनस्पति समूल नष्ट हो रहे हैं, जिसका सबसे बड़ा कारण है जंगल की कटायी।
इसकी गति इतनी तेज है कि हमारा समय ‘विलुप्ति का युग’ कहा जाने लगा है! वैसे तो पृथ्वी पर जितने भी जीव हुए हैं उनमें से ज्यादातर बहुत पहले विलुप्त हो चुके हैं। जीवन की लीला पुरानी रचनाओं को हटाती जाती है, नयी रचनाएँ गढ़ती जाती है!
हमारा जीना दूसरे जीवों पर निर्भर है। केवल भोजन जैसे साधनों के लिए ही नहीं, अपने स्वास्थ्य के लिए भी। हम जिस गति से अरण्य को बदल रहे हैं, उसका परिणाम हमें भोगना पड़ रहा है। इसके पर्याप्त प्रमाण हैं कि छूत की ज्यादातर बीमारियाँ पशुओं से हममें आयी हैं और हमसे उन्हें भी मिली हैं। इसका सबसे बड़ा कारण रहा है सभ्यताओं द्वारा खेती की जमीन और लकड़ी पाने के लिए वनों को काटना। एक और कारण है – अपने उपयोग के लिए जानवरों को पालतू बनाना, जिसके बाद हम कुत्ते, गाय, घोड़े और भेड़-बकरी जैसे जीवों के साथ रहने लगे। प्रकृति ने इनको और हमें साथ रहने के लिए नहीं बनाया है। औद्योगिक विकास ने वन-कटाई का एक और कारण निकाल लिया – खनिज!
जिस नये कोरोनावायरस ने 2020-22 में हमारी दुनिया को ठप्प कर दिया था, वह भी जंगल के उन जीवों से हममें आया है जिनके साथ रहने के लिए प्रकृति ने हमें बनाया नहीं है। पर्यावरण की बात करने वाले कई लोगों ने इस नयी महामारी को ईश्वर या प्रकृति के दंड की तरह देखा है, कि यह हमारे अभिमान का मर्दन है। यह कहने वाले ऐसा मानते हैं कि सृष्टि मनुष्य की बनायी न्याय व्यवस्था से चलती है! जैसे कुदरत के पैमाने इन्सान के खयालों से बने हैं! जिनमें हमारा किया-धरा किसी इन्साफ के तराजू में तौला जाता हो!
पर्यावरण विनाश का जो वर्णन हमें आधुनिक विज्ञान से मिल रहा है, वह हमारी कल्पना से बहुत बड़ा है। पर्यावरण रक्षा की बात करने वाले जिस तरह की नैतिकता में बात करते हैं, उसकी नीतियाँ मनुष्य की गढ़ी हुई हैं। उसमें पृथ्वी बचाने से ले के जो भी नैतिकता भरे संदेश दिये जाते हैं, वे हमारे बनाये फुट्टों से निकले हैं, हमारी कल्पना की पैदाइश हैं। अगर आप पर्यावरण संरक्षण की बात करने वालों से पूछें कि ‘जलवायु परिवर्तन’ क्या है, तो हर व्यक्ति उसे अपने-अपने आदर्शवाद से परिभाषित करता है।
यह पर्यावरण विज्ञान पढ़ाने वालों पर भी लागू होता है। अमूमन लोग इसे वायुमंडल में ‘ओजोन’ की परत में छेद के साथ जोड़ते हैं, जबकि उस समस्या का समाधान हो चुका है। कई लोग इसे वायु प्रदूषण का मामला मानते हैं।
जलवायु परिवर्तन इससे कहीं ज्यादा टेढ़ा मामला है। जीवाश्मों को जाँचने वाले हजारों विद्वानों को प्रमाण मिले हैं कि पिछले 50 करोड़ साल में पाँच महाप्रलय हुए हैं! इनमें से हरेक में बड़ी संख्या में जीव और वनस्पति प्रजातियाँ विलुप्त हुईं। इनमें से हरेक प्रलय के पहले या बाद में पृथ्वी की जलवायु में नाटकीय बदलाव आया था।
कई वैज्ञानिक कहते हैं कि छठा महाप्रलय शुरू हो चुका है, जिसका कारण है मनुष्य का औद्योगिक-आर्थिक विकास। पहले तो खेती के लिए जंगल कटते रहे। फिर औद्योगिक क्रांति के बाद बड़ी मात्रा में खनन होने लगा। पृथ्वी एक सीमित रचना है जिसमें हर जीव के विकास की सीमा है। इस सीमा को किसी तरह का पारंपरिक या आधुनिक ज्ञान-विज्ञान इंगित नहीं कर पाया है। सीमोल्लंघन के इस गणित में अपार सफलता का नतीजा अपार विफलता ही है!
हमारी असीम सफलता के इस औद्योगिक युग का एक नया नाम है – ‘ऐन्थ्रोपोसीन’! पुरानी यूनानी भाषा में इसका मतलब है ‘मनुष्य का नया युग’। इस नये कलयुग में धरती, सागर और हवा का शायद ही कोई हिस्सा हो जिसमें हमारे पैदा किए प्रदूषण का कोई-न-कोई चिह्न न मिलता हो! पिछले लगभग दो दशक से वैज्ञानिकों में बहस चल रही है – मतभेद कह लीजिए! – कि इस नये नाम को औपचारिक रूप से स्वीकार करें या नहीं।
इस नयी जानकारी की सामाजिक चर्चा दो तरह से होती है। पहला तरीका नकारात्मक है, जिसमें लोगों को डराया जाता है, प्रलय और सर्वनाश का भय दिखाया जाता है। दूसरे में लोगों को सकारात्मक विचार देने का प्रयास किया जाता है, ताकि लोग मिल-जुल के बेहतर भविष्य के लिए नीतिगत प्रयास करें, पृथ्वी को बचाएँ, पर्यावरण को बचाएँ…यह बचाएँ, वह बचाएँ …जैसे कि संपूर्ण सृष्टि अपनी रक्षा के लिए मनुष्य से याचना कर रही है!
दोनों ही तरीके सृष्टि को मनुष्य पर टिका हुआ देखते हैं! दोनों से ऐसा लगता है कि सृष्टि के असल कर्त्ता तो हम ही हैं! हमारे बिगाड़े दुनिया बिगड़ेगी, हमारे बचाये बच जाएगी! दोनों नजरियों में गजब का गुरूर है। दोनों असरदार नहीं हैं।
‘ऐन्थ्रोपोसीन’ का संकट आधुनिक विज्ञान के शास्त्र से उजागर हुआ है। राजाश्रय पर टिके आधुनिक विज्ञान के जो संस्थान कल तक ‘बिकाऊ’ विकास की बात कर रहे थे, वे आज ‘टिकाऊ’ विकास का गुणगान कर रहे हैं! ये लोग अपनी सुविधा के अनुसार ‘विकास’ के पहले विशेषण लगाते रहते हैं – ‘सतत विकास’ या ‘हरित विकास’ या ‘चिर विकास’, जैसी जरूरत हो वैसा माल इसके ज्ञान गोदाम में अटा पड़ा है! शास्त्रीय भाषा को बदलने में समय नहीं लगता! बस, राज्य की अनुकूलता होनी चाहिए! राज्य के प्रायोजक उद्योगों की अनुकूलता होनी चाहिए।
हर राज्य को, हर राजनीतिक विधा को ‘विकास’ की जरूरत है। इस बेहतर भविष्य का सपना बेचे बिना कोई भी राजनीतिक विचार अपना औचित्य नहीं बना सकता है। जब विकास का विष असुविधाजनक हो जाए, तब उसके आगे एक सुविधाजनक विशेषण लग जाता है।
साधारण समाज के लिए यह सब जी-का-जंजाल है। किंतु पर्यावरण के विनाश को समझने के लिए शास्त्रीय शिक्षा या विश्वविद्यालय की डिग्री या पी.एच.डी. या कोई प्रमाणपत्र नहीं चाहिए। जिस किसी की नाक है, आँख है, कान हैं, जीभ है, चमड़ी है…सहज समझ है…वह जानता है कि विकास का लालच निसर्ग को बदल रहे हैं। इसीलिए पर्यावरण की बातचीत को शास्त्रीय ज्ञान की बजाय हमारे सहज ‘अज्ञान’ के बोध से करना शायद लाभप्रद हो।
इस पर एक नजरिया एक जाने-माने ब्रिटिश पर्यावरण कार्यकर्त्ता जॉर्ज मार्शल का है। पर्यावरण चर्चा की निष्प्राणता को उन्होंने गहराई से समझा है, खास तौर पर जलवायु परिवर्तन को। कई सालों के अनुभव और अध्ययन से वे यह समझाते हैं कि पर्यावरण जैसे अमूर्त विषय को सहज रूप से समझना इतना कठिन क्यों है। सन् 2014 में उन्होंने एक अंग्रेजी पुस्तक लिखी जिसके शीर्षक का अनुवाद होगा – ‘ऐसा सोचना भी नहीं: क्योंकि हमारा मस्तिष्क जलवायु परिवर्तन समझने के लिए नहीं बना है’।
वे बताते हैं कि पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन की बातचीत आधुनिक विज्ञान के शास्त्र से आयी है। उसमें प्रधानता है प्रमाण की, तर्क की, बुद्धि की। ऐसे विमर्श में उस बोध, आस्था और विश्वास की जगह नहीं होती जो हमारे सहज स्वभाव का गुण है, अवगुण भी है। इसी आस्था का उपयोग राज्य-प्रयोजित धर्म करते हैं।
मार्शल कहते हैं कि पर्यावरण की कड़वी होती बातचीत हमारे विश्वास से बहुत कुछ सीख सकती है। अपने मानस के भीतर की इस खाई को पाटे बिना हम इस अभूतपूर्व चुनौती के लिए अपने आप को तैयार नहीं कर सकते। जॉर्ज मार्शल जिस विश्वास की बात करते हैं, वह राजाश्रय की शास्त्रीयता से नहीं निकला है! वह उपजा है सामाजिक व्यवहार और सहज आस्था से!
किसी तरह का आत्मलीन शास्त्रीय ज्ञान आज हमें बचा नहीं सकता, चाहे वह किसी पारंपरिक विधा से हो या आधुनिक ‘साइन्स’ से! हमें चाहिए अपने अज्ञान का सहज बोध! हमारे यहाँ के भक्ति कवियों में तो यह बात मिलती ही है, दुनिया भर में यह बतलाने वाले कई लोग हुए हैं कि हमारा ज्ञान हमारे अज्ञान के सामने बहुत छोटा है। प्राचीन यूनान के दार्शनिक सुकरात ने कहा था – “मैं इतना ही जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता”! काशी में “बहुहित की अकथ कथा” कहने वाले अनपढ़ जुलाहे कबीर ने बताया था – “खोजत फिरत राह नहीं जाना”। पंजाब के संत-कवि बुल्ले शाह ने कहा था – “बुल्ला की जाणा मैं कौन”!
बारहवीं सदी के ईसाई संत फ्रांसिस के जीवन में अपने अज्ञान के प्रति विनम्र चेतना दिखती है। उन्होंने दारिद्र का व्रत लिया था। पर्यावरण की सहज और गहरी समझ उनके जीवन और कृतित्व में झलकती है। कई जगहों के सूफी संतों ने भी यह बात की है। इनमें से बहुत से संतों को राजाश्रय नहीं मिला था, कुछ राजाश्रय से दूर भागते थे, कुछ अनपढ़ थे, कुछ अपंग भी थे। सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक का मजाक उड़ाने वाले शास्त्रीय ज्ञानियों को लोग इतना याद नहीं करते जितने प्यार से बाबा नानक का नाम लेते हैं!
ये बातें रहीम के दोहों की तरह साधारण समाज में आज भी व्याप्त हैं। लोग अपने सुख-दुख में इन संतों को याद करते हैं। वे राज्य और ज्ञान की सत्ता वाले शास्त्रीय ज्ञानियों को या उनके लिखे ग्रंथों को नहीं याद करते! आज पर्यावरण की सामाजिक बातचीत को भी हमारे स्वभाव के उस सहज अंग को छूना होगा, जिसे इन संतों ने छुआ।
आज हमें अपने और दूसरों के मत में भेद करने वाले, मत का दान करने वाले ज्ञान की बहुत जरूरत नहीं है। हमें चाहिए सम्मति देने वाला चेतन अज्ञान। जो सुपाच्य हो, सुलभ हो, सहज हो। वर्ना ‘ऐन्थ्रोपोसीन’ के ज्ञान का अजीर्ण तो है ही!
[इस लेख का संपादित रूप ‘सदानीरा’ पत्रिका के ग्रीष्म 2022 के ‘एंथ्रोपोसीन’ विशेषांक में प्रकाशित हुआ था]